लक्ष्मीर्यदङ्घ्रिकमलस्य नखाञ्चलस्य  - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (101)

लक्ष्मीर्यदङ्घ्रिकमलस्य नखाञ्चलस्य - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (101)

लक्ष्मीर्यदङ्घ्रिकमलस्य नखाञ्चलस्य सौन्दर्यबिन्दुमपि नार्हति लब्धुमीशे ।
सा त्वं विधास्यसि न चेन्मम नेत्रदानं किं जीवितेन मम दुःखदवाग्निदेन ।।

- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (101)

हे स्वामिनी, लक्ष्मी देवी भी आपके चरणारविन्द के नखाग्र प्रान्त के सौन्दर्य का एक बिन्दु मात्र भी प्राप्त नहीं कर सकती है। यदि आप मुझे अपने रूप-लीलादि के दर्शन योग्य नेत्र नहीं प्रदान करेंगी तो दावाग्नि के समान दुखदायी मेरे इस जीवन का क्या प्रयोजन है?