वृन्दावन की तौ उपमा कौं वृन्दावन ही हैं - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, वृंदावन प्रकाश माला (3)

वृन्दावन की तौ उपमा कौं वृन्दावन ही हैं - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, वृंदावन प्रकाश माला (3)

वृन्दावन की तौ उपमा कौं वृन्दावन ही हैं,
अति की मधुर याहि वन्दन करत हौं। [1]
राधाकृष्ण जू की उपमा कौं राधाकृष्ण ही हैं,
नित्य ही बिहार यहाँ हिय में भरत हौं॥ [2]
यहाँ नाना भाँति सब परिकर विराजें, जाकी
उपमा कौं सोई और हिय न धरति हौं। [3]
वस्तु है प्रगट यहाँ, सूझै हित ऐनक सौं,
या तैं चन्द हित ही के पाइन परत हौं॥ [4]

- श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, वृंदावन प्रकाश माला (3)

श्री वृन्दावन धाम की उपमा स्वयं श्री वृन्दावन धाम ही है। किसी अन्य से इसकी तुलना संभव नहीं है। यह अति मधुर है, और मैं इसका वंदन करता हूँ। [1]

श्री राधा-कृष्ण की उपमा भी स्वयं श्री राधा-कृष्ण ही हैं, जो नित्य श्री वृन्दावन में विहार परायण रहते हैं। मैं उन्हें अपने हृदय में सदा अंकित करता रहता हूँ। [2]

इस दिव्य वृन्दावन में सखियों के अनेक समूह हैं, जिनकी उपमा स्वयं वे ही हैं। उनके समान कोई उपमा मेरे हृदय में नहीं आती। [3]

श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी कहते हैं कि इस वृन्दावन की वस्तु तो नित्य विहार है, जो यहाँ प्रकट है। परंतु यह केवल “हित” [प्रेम] की भावना से ही हृदय में स्थान पाती है। इसी कारण मैं “हित” [प्रेम] के ही चरणों में प्रणाम करता हूँ और उसी की शरण में जाता हूँ। [4]