(राग वृंदावनी सारंग)
भज मन रास रसिक किशोर ।
गौर स्यामल सकल गुन निधि चतुर चित के चोर ॥ [1]
सुभग मण्डल पर विराजत जुगल सुन्दर वेष ।
बसन भूषन जगमगैं अति अंग-अंग सुदेस ॥ [2]
चारु चरन सुदेस निर्मल गति विलास विनोद ।
पदन पटकन नखन दमकन होत नव-नव मोद ॥ [3]
जोरि कबहूँ कर परस्पर बदन सन्मुख चारु ।
घन घटा से चलत दोऊ भ्रमत करत विहार ॥ [4]
मुकुट कबरी लटक भृकुटी मटक मधुरी हास ।
हरषि बरषत रंग भीनौं हित दामोदर दास ॥ [5]
- श्री हित दामोदर दास
हे मन, तू रास रस के रसिक जुगल किशोर श्री श्यामाश्याम का भजन कर । गौर वर्ण की श्री राधा एवं श्याम वर्ण के श्री कृष्ण समस्त गुणों के निधि हैं, चंचल चित्त को चुरानेवाले हैं । [1]
जुगल किशोर ने सुन्दर वेश धारण किया है एवं सुन्दर मंडल पर विराजमान हैं । उनके वस्त्र एवं आभूषण जगमगा रहे हैं एवं अंग-अंग अति सुन्दर प्रतीत हो रहे हैं । [2]
उनके सुन्दर निर्मल चरण कमल गतिमान हैं एवं दोनों विनोद कर रहे हैं । जब वे अपने चरण धरती पर पटकते हैं तो उनके नखमणि दमकते हैं एवं नए-नए आनंद को प्रदान करते हैं । [3]
जुगल किशोर कभी-कभी एक-दूसरे का हाथ पकड़कर सन्मुख हो जाते हैं तब वे बहुत मनोहर लगते हैं । दोनों मेघ-दामिनी की भांति विहार कर रहे हैं । [4]
श्री दामोदर दास कहते हैं कि श्यामाश्याम के मुकुट जूड़े संग लटक रहे हैं, भृकुटि मटक रही है एवं मुख-कमल पर मधुर मुस्कान है, इस अद्भुत प्रेम की वर्षा में मैं हर्षित होकर भीग रहा हूँ । [5]
भज मन रास रसिक किशोर ।
गौर स्यामल सकल गुन निधि चतुर चित के चोर ॥ [1]
सुभग मण्डल पर विराजत जुगल सुन्दर वेष ।
बसन भूषन जगमगैं अति अंग-अंग सुदेस ॥ [2]
चारु चरन सुदेस निर्मल गति विलास विनोद ।
पदन पटकन नखन दमकन होत नव-नव मोद ॥ [3]
जोरि कबहूँ कर परस्पर बदन सन्मुख चारु ।
घन घटा से चलत दोऊ भ्रमत करत विहार ॥ [4]
मुकुट कबरी लटक भृकुटी मटक मधुरी हास ।
हरषि बरषत रंग भीनौं हित दामोदर दास ॥ [5]
- श्री हित दामोदर दास
हे मन, तू रास रस के रसिक जुगल किशोर श्री श्यामाश्याम का भजन कर । गौर वर्ण की श्री राधा एवं श्याम वर्ण के श्री कृष्ण समस्त गुणों के निधि हैं, चंचल चित्त को चुरानेवाले हैं । [1]
जुगल किशोर ने सुन्दर वेश धारण किया है एवं सुन्दर मंडल पर विराजमान हैं । उनके वस्त्र एवं आभूषण जगमगा रहे हैं एवं अंग-अंग अति सुन्दर प्रतीत हो रहे हैं । [2]
उनके सुन्दर निर्मल चरण कमल गतिमान हैं एवं दोनों विनोद कर रहे हैं । जब वे अपने चरण धरती पर पटकते हैं तो उनके नखमणि दमकते हैं एवं नए-नए आनंद को प्रदान करते हैं । [3]
जुगल किशोर कभी-कभी एक-दूसरे का हाथ पकड़कर सन्मुख हो जाते हैं तब वे बहुत मनोहर लगते हैं । दोनों मेघ-दामिनी की भांति विहार कर रहे हैं । [4]
श्री दामोदर दास कहते हैं कि श्यामाश्याम के मुकुट जूड़े संग लटक रहे हैं, भृकुटि मटक रही है एवं मुख-कमल पर मधुर मुस्कान है, इस अद्भुत प्रेम की वर्षा में मैं हर्षित होकर भीग रहा हूँ । [5]

