॥ दोहा ॥
और कछु अभिलाष नहिं, अहो कुँवरि सुनि एह ।
सदा चरन-बनजात में, रहौ सहज मो नेह ॥
॥ पद ॥
रहौ मेरो नेह चरन-बनजात ।
कुँवरि किसोरी स्यामा गोरी सहज सदा रँगरात ॥ [1]
और कछु अभिलाष न बलि जाऊँ इहि लालच ललचात ।
श्रीहरिप्रिया निरन्तर ध्याऊँ परिहरि दूजी बात ॥ [2]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणि, सहज सुख (88)
श्रीलालजू कह रहे हैं -
॥ दोहा ॥
हे कुँवरि किशोरीजू, आप सुनिये, मेरी एकमात्र यही अभिलाषा है कि आपके चरण-कमलों में मेरा स्वाभाविक स्नेह सदा बना रहे।
॥ पद ॥
हे कुँवरि किशोरी श्यामागोरी जू, मेरी एकमात्र यही अभिलाषा है कि आपके चरण कमलों में मेरा स्नेह सदा बना रहे और उन्हीं चरणों के स्वाभाविक अनुराग से मेरा हृदय सदा रञ्जित होता रहे । [1]
एकमात्र इसी लालच से मेरा हृदय सदा ललचाता रहता है । हे श्रीहरिप्रिया सखी, मैं यह चाहता हूँ कि और सब बातों को छोड़कर उन चरण-कमलों का ही मैं निरन्तर ध्यान करता रहूँ । [2]
और कछु अभिलाष नहिं, अहो कुँवरि सुनि एह ।
सदा चरन-बनजात में, रहौ सहज मो नेह ॥
॥ पद ॥
रहौ मेरो नेह चरन-बनजात ।
कुँवरि किसोरी स्यामा गोरी सहज सदा रँगरात ॥ [1]
और कछु अभिलाष न बलि जाऊँ इहि लालच ललचात ।
श्रीहरिप्रिया निरन्तर ध्याऊँ परिहरि दूजी बात ॥ [2]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणि, सहज सुख (88)
श्रीलालजू कह रहे हैं -
॥ दोहा ॥
हे कुँवरि किशोरीजू, आप सुनिये, मेरी एकमात्र यही अभिलाषा है कि आपके चरण-कमलों में मेरा स्वाभाविक स्नेह सदा बना रहे।
॥ पद ॥
हे कुँवरि किशोरी श्यामागोरी जू, मेरी एकमात्र यही अभिलाषा है कि आपके चरण कमलों में मेरा स्नेह सदा बना रहे और उन्हीं चरणों के स्वाभाविक अनुराग से मेरा हृदय सदा रञ्जित होता रहे । [1]
एकमात्र इसी लालच से मेरा हृदय सदा ललचाता रहता है । हे श्रीहरिप्रिया सखी, मैं यह चाहता हूँ कि और सब बातों को छोड़कर उन चरण-कमलों का ही मैं निरन्तर ध्यान करता रहूँ । [2]

