(राग आसावरी त्रिताल)
मन श्री राधा-राधा कहि रे ।
नाम निरन्तर रसना पीवे, दृढ़कर याको गहि रे ॥ [1]
यह जग सपनो अपनो नाही, नाम सुधा-रस बहि रे ।
श्रीगोपालहित हरी स्वामिनि, जैसे राखे रहि रे ॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (76)
हे मन! "श्री राधा राधा" नाम का रटन कर इसका निरंतर अपनी रसना से पान कर एवं दृढ़ता पूर्वक इस नाम की शरण ग्रहण कर । [1]
यह जग एक झूठे सपने की तरह है और हमारा अपना नहीं है; इसलिए इस नाम रूपी सुधा रस में डूबना सीख । श्री हित गोपाल दास कहते हैं कि श्री राधा श्री हरि की भी स्वामिनी हैं, इसलिए वे जिस प्रकार भी तुम्हें रखती हैं, उसमें सदा प्रसन्न रहना चाहिए। [2]
मन श्री राधा-राधा कहि रे ।
नाम निरन्तर रसना पीवे, दृढ़कर याको गहि रे ॥ [1]
यह जग सपनो अपनो नाही, नाम सुधा-रस बहि रे ।
श्रीगोपालहित हरी स्वामिनि, जैसे राखे रहि रे ॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (76)
हे मन! "श्री राधा राधा" नाम का रटन कर इसका निरंतर अपनी रसना से पान कर एवं दृढ़ता पूर्वक इस नाम की शरण ग्रहण कर । [1]
यह जग एक झूठे सपने की तरह है और हमारा अपना नहीं है; इसलिए इस नाम रूपी सुधा रस में डूबना सीख । श्री हित गोपाल दास कहते हैं कि श्री राधा श्री हरि की भी स्वामिनी हैं, इसलिए वे जिस प्रकार भी तुम्हें रखती हैं, उसमें सदा प्रसन्न रहना चाहिए। [2]

![मन श्री राधा-राधा कहि रे - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (76)](https://images.brajrasik.org/6335d5db96a4b700090dda24-m.jpeg)