नित हित चित के माहि, लाल किसोरी रटतु हैं ।
और न कछू सुहाहिं, राति-दिवस यों कटतु हैं ॥
- श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (31)
अपने हृदय को नित्य प्रेम-रस में डुबाकर, श्री कृष्ण नित्य ही “श्री राधा” नाम रटते हैं। उन्हें अन्य कुछ भी रुचिकर नहीं लगता; उनका समस्त दिन-रात इसी नाम-स्मरण में बीतता है।
और न कछू सुहाहिं, राति-दिवस यों कटतु हैं ॥
- श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (31)
अपने हृदय को नित्य प्रेम-रस में डुबाकर, श्री कृष्ण नित्य ही “श्री राधा” नाम रटते हैं। उन्हें अन्य कुछ भी रुचिकर नहीं लगता; उनका समस्त दिन-रात इसी नाम-स्मरण में बीतता है।

