(राग केदारौ)
सोई तौ बचन मोसौं मानि
तैं मेरौ लाल मोह्यौ री साँवरौ ।
नव निकुंज सुख पुंज महल में
सुबस बसौ यह गाँवरौ॥ [1]
नव नव लाड़ लड़ाइ लाड़िली
नहिं नहिं यह ब्रज जाँवरौ।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी पै
बारौंगी मालती भाँवरौ॥ [2]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (44)
निकुंज महल में दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण विराजमान हैं। उसी समय श्री राधा अपना प्रतिबिंब देखते हुए, अपने ही प्रतिबिंब से मधुर वचन कहने लगीं:
हे सुंदरी मेरी बात मानो। बताओ तुमने किन-किन गुणों से मेरे साँवरे को मोह लिया है। नव निकुंज वन जो समस्त सुखों का धाम है वहाँ तुमने निःसंकोच ही अपना निवास बना लिया है । [1]
इस निकुंज महल के नव नव प्रेम रस विलास के कारण ही वह [कृष्ण] कभी भी ब्रज [निकुंज वन को छोड़कर] नहीं जाता।
श्री हरिदास के स्वामी दिव्य युगल श्री श्यामा कुंजबिहारी जो मालती के पुष्प और भ्रमर [जो उस पुष्प पर आसक्त है] पर अपना सर्वस्व नयौछावर करती हूँ । [2]

