(सवैया)
अंजन मंजन त्यागौ अली, अंग धारि भभूत करौ अनुरागै। [1]
आपुन भाग कर्यौ सजनी, इन बावरे ऊधौ जू को कहाँ लागै॥ [2]
चाहै सो और सबै करियै, जु कहै रसखान सयानप आगै। [3]
जो मन मोहन ऐसी बसी, तो सबै री कहौ मुख गोरस जागै॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
जब उद्धव ने गोपियों को संदेश दिया कि वे योग को अपनाकर श्रीकृष्ण-वियोग में तड़पना छोड़ दें, तब भी गोपियाँ भक्ति-पथ पर अडिग रहीं। उन्होंने बाहरी आडंबर को त्यागकर मन से श्रीकृष्ण की प्रेमपूर्ण भक्ति को ही अपनाया। तब उद्धव के उपदेश का उपहास उड़ाते हुए वे कहती हैं—
हे सखी! क्या अब हमें स्नान-श्रृंगार छोड़कर अंग में भस्म धारण कर ब्रह्म अनुराग करना चाहिए? [1]
सखी! तू तो अपने मन की कर। हमारे सर्वस्व तो श्रीकृष्ण हैं। यह उद्धव तो बावरे हैं, प्रेम-पथ को क्या समझेंगे? [2]
चाहे तो और सब कर ले, पर एक बार बुद्धिमानी से विचार कर लेना। [3]
हम सबके मन में श्रीकृष्ण बसे हैं, सबका हृदय उनके गोरस लगे मुख पर ही आश्रित है (अर्थात हमें तो केवल प्रेम-पथ ही अपनाना है)। [4]
अंजन मंजन त्यागौ अली, अंग धारि भभूत करौ अनुरागै। [1]
आपुन भाग कर्यौ सजनी, इन बावरे ऊधौ जू को कहाँ लागै॥ [2]
चाहै सो और सबै करियै, जु कहै रसखान सयानप आगै। [3]
जो मन मोहन ऐसी बसी, तो सबै री कहौ मुख गोरस जागै॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
जब उद्धव ने गोपियों को संदेश दिया कि वे योग को अपनाकर श्रीकृष्ण-वियोग में तड़पना छोड़ दें, तब भी गोपियाँ भक्ति-पथ पर अडिग रहीं। उन्होंने बाहरी आडंबर को त्यागकर मन से श्रीकृष्ण की प्रेमपूर्ण भक्ति को ही अपनाया। तब उद्धव के उपदेश का उपहास उड़ाते हुए वे कहती हैं—
हे सखी! क्या अब हमें स्नान-श्रृंगार छोड़कर अंग में भस्म धारण कर ब्रह्म अनुराग करना चाहिए? [1]
सखी! तू तो अपने मन की कर। हमारे सर्वस्व तो श्रीकृष्ण हैं। यह उद्धव तो बावरे हैं, प्रेम-पथ को क्या समझेंगे? [2]
चाहे तो और सब कर ले, पर एक बार बुद्धिमानी से विचार कर लेना। [3]
हम सबके मन में श्रीकृष्ण बसे हैं, सबका हृदय उनके गोरस लगे मुख पर ही आश्रित है (अर्थात हमें तो केवल प्रेम-पथ ही अपनाना है)। [4]

