नित्य विहार सार सबको, अति दुर्लभ अगम अपार ।
अनन्य धर्म संधि समझै बिन, माया कठिन किवार ॥
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी (4)
हे भाई, समस्त परमार्थ-उपासनों का सार एवं अति दुर्लभ, अगम और अपार नित्य-विहार-रस ऐसा है कि उसमें अनन्य धर्म (प्रिया-प्रियतम के विहार) का अनुसरण करने वालों का ही प्रवेश है; मायिक देह-संबंधी सुख की तो उसमें कोई चर्चा ही नहीं।
अनन्य धर्म संधि समझै बिन, माया कठिन किवार ॥
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी (4)
हे भाई, समस्त परमार्थ-उपासनों का सार एवं अति दुर्लभ, अगम और अपार नित्य-विहार-रस ऐसा है कि उसमें अनन्य धर्म (प्रिया-प्रियतम के विहार) का अनुसरण करने वालों का ही प्रवेश है; मायिक देह-संबंधी सुख की तो उसमें कोई चर्चा ही नहीं।

