(सवैया)
इस प्यासे पपीहे से लोचन को, निज दर्शन स्वाति पिला दे जरा। [1]
यह माया मरीचिका दूर हटा, दृढ़ प्रेम का पाठ पढ़ाजा जरा॥ [2]
नव नीरद वेश लिये मुरली, इन नयनों के बीच समा जा जरा। [3]
अरे निष्ठुर मोहन आजा जरा, वह रूप अनूप दिखा जा जरा॥ [4]
- ब्रज के सेवैया (श्री हरे कृष्ण जी द्वारा रचित)
हे श्रीकृष्ण! मेरे इन प्यासे पपीहा-समान नेत्रों को अपना दर्शन देकर स्वाति-बूँद-सा अमृत पिला दीजिए। [1]
अपनी दुर्लभ माया को दूर कर दृढ़ प्रेम का अमूल्य पाठ पढ़ा दीजिए। [2]
हाथ में मुरली लिए, नवीन मेघ-सा सुंदर वेश धारण कर मेरी आँखों में सदा-सर्वदा के लिए बस जाइए। [3]
अरे निष्ठुर मनमोहन! अब तो पधारिए और अपना अद्भुत रूप दिखा दीजिए। [4]
इस प्यासे पपीहे से लोचन को, निज दर्शन स्वाति पिला दे जरा। [1]
यह माया मरीचिका दूर हटा, दृढ़ प्रेम का पाठ पढ़ाजा जरा॥ [2]
नव नीरद वेश लिये मुरली, इन नयनों के बीच समा जा जरा। [3]
अरे निष्ठुर मोहन आजा जरा, वह रूप अनूप दिखा जा जरा॥ [4]
- ब्रज के सेवैया (श्री हरे कृष्ण जी द्वारा रचित)
हे श्रीकृष्ण! मेरे इन प्यासे पपीहा-समान नेत्रों को अपना दर्शन देकर स्वाति-बूँद-सा अमृत पिला दीजिए। [1]
अपनी दुर्लभ माया को दूर कर दृढ़ प्रेम का अमूल्य पाठ पढ़ा दीजिए। [2]
हाथ में मुरली लिए, नवीन मेघ-सा सुंदर वेश धारण कर मेरी आँखों में सदा-सर्वदा के लिए बस जाइए। [3]
अरे निष्ठुर मनमोहन! अब तो पधारिए और अपना अद्भुत रूप दिखा दीजिए। [4]

