भ्रमरी ह्वै कब डोलिहौं, श्री वृन्दावन गैल ।
पदपंकज मकरंदरस, पैहौं दोऊ छैल ॥
- ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (70)
कब ऐसा शुभ समय आएगा जब मैं भ्रमरी बनकर श्री वृंदावन की पावन गलियों में विचरूँगा और श्री राधा-कृष्ण के चरण-कमलों से झरते दिव्य मकरंद-रस का आस्वादन कर सकूँगा?
पदपंकज मकरंदरस, पैहौं दोऊ छैल ॥
- ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (70)
कब ऐसा शुभ समय आएगा जब मैं भ्रमरी बनकर श्री वृंदावन की पावन गलियों में विचरूँगा और श्री राधा-कृष्ण के चरण-कमलों से झरते दिव्य मकरंद-रस का आस्वादन कर सकूँगा?

