(राग भैरवी)
मेरी सरबस जीवन प्यारी ।
पल्कान्तर ही ओट होय तब
विह्वल अति ही होत विहारी ॥ [1]
केवल कृपा दृष्टिसे मिलि है
चरनशरन महिमा अतिभारी ।
अलीमाधुरी कों अपनाई
स्वामिनि अपनी ओर निहारी ॥ [2]
- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, मंगल (12)
मेरी जीवन सर्वस्व श्री राधा प्यारी हैं, जिनके दर्शन में एक पलक के अंतराल से ही श्री कृष्ण अति विह्वल हो जाते हैं । [1]
श्री राधा के चरण कमलों की शरण उन्हीं की केवल कृपादृष्टि से प्राप्त होती है, जिसकी अनंत महिमा है । श्री अलिमाधुरी जी कहते हैं "श्री स्वामिनी जू ने अपने कृपालु स्वभाव की ओर देखकर ही मुझे अपनाया है (मेरी साधना के कारण नहीं) ।" [2]
मेरी सरबस जीवन प्यारी ।
पल्कान्तर ही ओट होय तब
विह्वल अति ही होत विहारी ॥ [1]
केवल कृपा दृष्टिसे मिलि है
चरनशरन महिमा अतिभारी ।
अलीमाधुरी कों अपनाई
स्वामिनि अपनी ओर निहारी ॥ [2]
- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, मंगल (12)
मेरी जीवन सर्वस्व श्री राधा प्यारी हैं, जिनके दर्शन में एक पलक के अंतराल से ही श्री कृष्ण अति विह्वल हो जाते हैं । [1]
श्री राधा के चरण कमलों की शरण उन्हीं की केवल कृपादृष्टि से प्राप्त होती है, जिसकी अनंत महिमा है । श्री अलिमाधुरी जी कहते हैं "श्री स्वामिनी जू ने अपने कृपालु स्वभाव की ओर देखकर ही मुझे अपनाया है (मेरी साधना के कारण नहीं) ।" [2]

