(राग केदारो)
सरद सुहाई जामिनि, भामिनि रास रच्यौ ।
वंसीवट जमुनातट सीतल मंद सुगंध समीर सच्यौ ॥ [1]
बजत मृदंग ताल राधा सँग मोहन सरस सुधंग नच्यौ ।
उरप तिरप गति सुलप लेति अति निरखत विथकित मदन लच्यौ ॥ [2]
कोककला संगीत गीत रसरूप मधुरता गुन न बच्यौ ।
भृकुटि विलास हास अवलोकत, व्यास परम सुख नैंन खच्यौ ॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (234)
शरद कि सुहावनी रात्रि में भामिनी श्री राधा ने रास रचा है । यमुना तट पर वंशीवट के निकट प्रवाहमान शीतल-मंद-सुगंधित पवन सुखमय है । [1]
मधुर ताल में मृदंग बज रहा है, श्री राधा के संग श्री कृष्ण सरस एवं सुन्दर ढंग से नृत्य कर रहे हैं । दोनों नृत्य में संगीत के साथ सुन्दर गति ले रहे हैं, जिनके दर्शन से मदन विथकित हो गया है । [2]
कोककला (प्रेम विद्या), संगीत, गीत, रस, रूप, मधुरता आदि कोई भी गुण नहीं बचा जो रास में दृष्टिगोचर न हो । श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि श्री श्यामाश्याम के भृकुटि विलास एवं हास-परिहास का अवलोकन कर मेरे नेत्रों को परम सुख की अनुभूति हो रही है । [3]
सरद सुहाई जामिनि, भामिनि रास रच्यौ ।
वंसीवट जमुनातट सीतल मंद सुगंध समीर सच्यौ ॥ [1]
बजत मृदंग ताल राधा सँग मोहन सरस सुधंग नच्यौ ।
उरप तिरप गति सुलप लेति अति निरखत विथकित मदन लच्यौ ॥ [2]
कोककला संगीत गीत रसरूप मधुरता गुन न बच्यौ ।
भृकुटि विलास हास अवलोकत, व्यास परम सुख नैंन खच्यौ ॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (234)
शरद कि सुहावनी रात्रि में भामिनी श्री राधा ने रास रचा है । यमुना तट पर वंशीवट के निकट प्रवाहमान शीतल-मंद-सुगंधित पवन सुखमय है । [1]
मधुर ताल में मृदंग बज रहा है, श्री राधा के संग श्री कृष्ण सरस एवं सुन्दर ढंग से नृत्य कर रहे हैं । दोनों नृत्य में संगीत के साथ सुन्दर गति ले रहे हैं, जिनके दर्शन से मदन विथकित हो गया है । [2]
कोककला (प्रेम विद्या), संगीत, गीत, रस, रूप, मधुरता आदि कोई भी गुण नहीं बचा जो रास में दृष्टिगोचर न हो । श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि श्री श्यामाश्याम के भृकुटि विलास एवं हास-परिहास का अवलोकन कर मेरे नेत्रों को परम सुख की अनुभूति हो रही है । [3]

