झलक अपनी मदनमोहन दिखादोगे तौ क्या होगा ॥
हैं अँखियाँ दरश बिन वेकल, परे नहीं एक पल भी कल ।
इन्हें तुम दारु नेत्रों की, पिलादोगे तो क्या होगा ॥ [1]
पड़ी मझधार में नैया, नहीं कोई पार लगवैया ।
अगर तुम पार करुणाकर, लगादोगे तौ क्या होगा ॥ [2]
बड़े शत्रु हैं या तन में, करैं हैं खेद छिन-छिन में ।
मुझे कुल दाव इनके से, बचादोगे तो क्या होगा ॥ [3]
सहायक हो तुम्हीं सबके, तुम्हीं हो नाथ निरधन के ।
कहै 'श्यामा' मेरी बिगड़ी, बनादोगे तो क्या होगा ॥ [4]
- श्यामा सखी (सनम साहब)
हे मदनमोहन, अपनी एक झलक दिखलादोगे तो क्या हो जायेगा ।
मेरी आँखें तुम्हारे दर्शन के बिना व्याकुल हैं, इन्हें एक पल का भी चैन नहीं है ।
मेरी आँखों को यदि तुम अपने नयन कमलों का प्रेम-रस पिलादोगे तो क्या हो जायेगा । [1]
मेरी नैया बीच मझदार में पड़ी हुई है, इसे कोई पार लगानेवाला नहीं है ।
हे करुणाकर, यदि तुम इसे पार लगादोगे तो क्या हो जायेगा । [2]
मेरे तन में बहुत शत्रु हैं, जो हर क्षण मुझे पीड़ा दे रहे हैं ।
यदि तुम इन शत्रुओं के प्रकोप से मुझे बचालोगे तो क्या हो जायेगा । [3]
हे कृष्ण, तुम्हीं सबके सहायक हो, तुम्हीं दीनों के नाथ हो ।
श्री श्यामा सखी (सनम साहब) कहते हैं कि हे श्यामसुंदर, मेरी बिगड़ी बनादोगे तो क्या जायेगा । [4]
हैं अँखियाँ दरश बिन वेकल, परे नहीं एक पल भी कल ।
इन्हें तुम दारु नेत्रों की, पिलादोगे तो क्या होगा ॥ [1]
पड़ी मझधार में नैया, नहीं कोई पार लगवैया ।
अगर तुम पार करुणाकर, लगादोगे तौ क्या होगा ॥ [2]
बड़े शत्रु हैं या तन में, करैं हैं खेद छिन-छिन में ।
मुझे कुल दाव इनके से, बचादोगे तो क्या होगा ॥ [3]
सहायक हो तुम्हीं सबके, तुम्हीं हो नाथ निरधन के ।
कहै 'श्यामा' मेरी बिगड़ी, बनादोगे तो क्या होगा ॥ [4]
- श्यामा सखी (सनम साहब)
हे मदनमोहन, अपनी एक झलक दिखलादोगे तो क्या हो जायेगा ।
मेरी आँखें तुम्हारे दर्शन के बिना व्याकुल हैं, इन्हें एक पल का भी चैन नहीं है ।
मेरी आँखों को यदि तुम अपने नयन कमलों का प्रेम-रस पिलादोगे तो क्या हो जायेगा । [1]
मेरी नैया बीच मझदार में पड़ी हुई है, इसे कोई पार लगानेवाला नहीं है ।
हे करुणाकर, यदि तुम इसे पार लगादोगे तो क्या हो जायेगा । [2]
मेरे तन में बहुत शत्रु हैं, जो हर क्षण मुझे पीड़ा दे रहे हैं ।
यदि तुम इन शत्रुओं के प्रकोप से मुझे बचालोगे तो क्या हो जायेगा । [3]
हे कृष्ण, तुम्हीं सबके सहायक हो, तुम्हीं दीनों के नाथ हो ।
श्री श्यामा सखी (सनम साहब) कहते हैं कि हे श्यामसुंदर, मेरी बिगड़ी बनादोगे तो क्या जायेगा । [4]

