श्री वृन्दावनदेवाचार्य जी की जीवनी

श्री वृन्दावनदेवाचार्य जी की जीवनी

जन्म :
श्री वृन्दावन देवाचार्य जी श्रीनिम्बार्क संप्रदाय के एक महान् प्रतापी आचार्य हो गये हैं । आचार्यपीठ सलेमाबाद (अजमेर), जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर एवं किशनगढ़ आदि राज्यों की तवारिखों में 1735 से 1797 तक इनके नामों का उल्लेख मिलता है । जिससे ज्ञात होता है कि इनका जन्म संभवतः 1697 के आस-पास हुआ होगा । 1754 में श्री वृन्दावन देवाचार्य जी अपने गुरुवर्य आचार्यवर्य श्रीनारायण देवाचार्य जी के गोलोकधाम वास पश्चात आचार्यपीठासीन हुए थे । 

शिष्य :
श्री वृन्दावन देवाचार्य जी के अमित तेज से प्रभावित होकर जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, किशनगढ़ आदि राज्यों के तत्कालीन नरेशों ने इनका आनुगत्य स्वीकार कर लिया था । कई उच्चकोटि के विद्वान् एवं कवि भी इनके शिष्य हो गये थे जिनमें पं० श्रीजयरामशेष, श्रीव्रजानन्दजी, श्रीघनानन्दजी, श्रीनागरीदासजी आदि का नाम विशेष उल्लेखनीय है । पं० श्रीजयरामशेष के पाण्डित्य से जयपुर के महाराजा श्रीजयसिंह द्वितीय तो बहुत प्रभावित थे । श्रीघनानन्दजी ने भी सांप्रदायिक सिद्धान्त एवं उपासना पद्धति का पूर्ण परिचय इन्हीं से प्राप्त किया था । इन्होंने अपने गुरुदेव श्री वृन्दावन देवाचार्य के स्वरूप का वर्णन करते हुए लिखा है -

श्रीवृन्दावनदेवाय गुरवे परमात्मने ।
मनोमंजरिरूपाय युग्म-संगानुचारिणे ॥
भजेऽहं वनाधीशदेवं महान्तं
महासौम्यरूपं जनानां सुशान्तम् ।
सदा प्रेममत्तं महाप्रेमगम्यं
मुखे राधिकाकृष्णलीला - सुरम्यम् ॥

इसी प्रकार महाराजा श्रीजयसिंह ने भी इनके चरणों में आकर श्रद्धाञ्जलि समर्पित की है, उससे इनकी विद्वता, शास्त्रार्थकुशलता, आराध्ययुगल की सेवा -परायणता, दयालुता आदि विभिन्न गुणों का सुन्दर परिचय मिलता है -

वादिनागकुले सिंहं भाष्याविरोधकारिणम् ।
श्रीमन्नारायणं साक्षात् वृन्दावनगुरुं भजे ॥
सर्वाचार्य्यमहार्य्यं बै महाप्रेमप्रवर्षिणम् ।
श्रीमन्नारायणं साक्षात् वृन्दावनगुरुं भजे ॥
भक्तपालं दयालुं च देवेशं रसिकेश्वरम् ।
श्रीमन्नारायणं साक्षात् वृन्दावनगुरुं भजे ॥
श्रीराधाकृष्णरहस्यज्ञं युग्मसेवापरायणम् ।
श्रीमन्नारायणं साक्षात् वृन्दावनगुरुं भजे ॥

आचार्यपीठ सलेमाबाद के अत्यन्त सन्निकट महाराजा किशनसिंह द्वारा संस्थापित 'किशनगढ़' की राजधानी 'रूपनगर थी । वहाँ के तत्कालीन राजा, राजमहिलायें ही नहीं अपितु सारा राज-परिकर ही श्री वृन्दावन देवाचार्य जी का शिष्य हो गया था । राजा श्री राजसिंहजी, राजमहिषी बाँकावतीजी, राजकुमार श्रीसावंतसिंहजी (उपनाम नागरीदास), राजकुमारी सुन्दरकुँवरि, एवं दास-दासियाँ भी इनकी कृपा एवं प्रेरणा से कवित्व शक्ति संपन्न हो काव्य-साधना में लग गयी थीं । बनीठनी आदि इसी कोटि की महिलायें है । राजकुमारी सुन्दरिकुँवरि के ये उद्गार दर्शनीय है -

भक्ति मुक्ति ठाम श्रीपरशुरामदेव जू की गादी,
है सलीमाबाद तहाँ पाप काँपही ।
कोटि कोटि जन्म सुकृत उदय तातैं,
पावैं महाभागीजन सेवत सजापही ॥
जहाँ कलिकाल के अँधियारे के तिमिरहर,
वृन्दावनदेव जू प्रकट प्रभु आपही ।
दीन के दयाल मोसी पतित निहाल कीनी,
लीनी अपनाय अब बन्दौं यहि छापही ॥

जयपुर के प्रसिद्ध कवि मंडन ने इनके अद्भुत तेज का वर्णन करते हुए लिखा है -

भये नारायणदेव के श्रीवृन्दावनदेव ।
तिनके श्रीजयसाह नै करी चरण की सेव ॥
श्रीवृन्दावनदेव को देत देव ऋषि दाद ।
रघुकुल श्रीजयसाह सों किय तप बलकौ बाद॥

किशनगढ़ के चित्रकोष में उपलब्ध चित्र सं० 148 के पृष्ठभाग पर लिखित यह छप्पय भी इनकी कवित्व शक्ति, विद्वत्ता, धर्मपरायणता आदि का गान कर रहा हैं -

दिनकर लौं जगमग प्रताप जस जक्त अखंडित ।
रसभाषा कविराज महा दिग्विजयी पंडित ॥
अति निबह्यो ऐश्वर्य भूप भये आज्ञाकारी ।
अन्त समय लौं परम धर्म मरजादा पाली ॥
श्रीनिम्बादित्य पद्धति बहे हरिव्यासदेव गादी स्थिति
श्रीवृन्दावनदेव महान्तसे दिग्गज भये न होंहि छिति ॥

रचनायें -
श्री वृन्दावन देवाचार्य जी के संस्कृत एवं व्रजभाषा दोनों ही भाषाओं में ग्रन्थ उपलब्ध हो रहे हैं । 'भक्ति सिद्धान्त कौमुदी' में भक्ति के स्वरूप का सुन्दर विवेचन है । समयानुरूप नवीन मतों के खण्डन के लिए इन्होंने ब्रह्मसूत्रों पर एक भाष्य भी लिखा था, पर अभी तक उपलब्ध नहीं हो पाया है । इसके अतिरिक्त व्रजभाषा में गीतामृतगंगा, दीक्षा-मंगल, और युगल परिवार चंद्रिका उपलब्ध है।
गीतामृतगंगा इनकी सर्वोत्कृष्ट रचना है।
'वृन्दावनहिमगिरि' से प्रवाहित इस 'गीतामृतगंगा' की रस धारा में अवगाहनार्थ आचार्यश्री ने भक्तोंकी सुविधा के लिए इसमें चौदह घाटोंका निर्माण कर दिया है । आमन्त्रण देते हुए कहते हैं -

वृन्दाबन गिरि तैं चली रस की उठत तरंग ।
करहु स्नान नित भक्त मन इहिं गीतामृत गंग ॥

केवल भक्तों को ही नहीं, उदार आचार्यश्री विषयीजनों को भी इसका सेवन करने के लिए परामर्श देते हैं -

बक विषयीजन परस इहि वेउ विमल ह्वै जाउ ।
जानि अजानि लगै जु अय पारस करै प्रभाउ ॥

इस रस-गंगा की पहली धारा ही कितनी सरस, सुखद एवं मनोहर है जिसके संस्पर्श मात्र से नित नव दूलह- दुलहिन प्रियालाल की मधुर झाँकी अन्तस्तल को गुदगुदा देती है -

मुरली मधुर बजाइ कैं जिन मोही ब्रजबाल ।
सोई नित प्रति गाइये दिन दूलह गोपाल ॥

इस 'गीतामृत रसगंगा' का प्रत्येक घाट रसिकों की रुचि के अनुरूप निर्मित है । प्रत्येक घाट पर एक विशिष्ट रस का समास्वादन होता है । किसी घाट से वात्सल्य रस की लहरें टकराती हैं तो किसी से नवयौवनमदमत्त लाल के रास-विलास से समुल्लसित मधुर रस की तरंगे -

आँगन खेलत बाल-गोविन्द ।
इन्द्रनीलमनि वरन श्याम तन नख शिख आनन्दकन्द ॥
विथुरि रही सिर कुटिल लटूरी मृदु मुसुकत मुखचन्द ।
घुटूरुन चलत किंकिनी नूपुर बाजत मन्दहिं मन्द ॥
बिरहू रहत किलकि रींगत अति निरखि यशोमतिनंद ।
वृन्दावन प्रभु अद्भुत लीला गावत चार्यो छन्द ॥

आचार्यश्री की मधुमयी व्रजभाषा में उनके आराध्य रसलम्पट लाल की एक और झांकी का अवलोकन करें -

तेरी छबि देखि छके पिय नैना ।
घूमत झुकत झिझकत झपकत लाल लाल भये दिन रैना ॥
मानत न काहू कानि लगी टगी तोही सौं फिरत न क्यों हूँ प्यारी सुख देै ना ।
वृन्दावन प्रभु की उह सोभा निरखत थकित ह्वै रहत दोऊ रति मैना ॥

भला, जिस महाभाग को लाल की इस छवि को निरखने का सौभाग्य मिल चुका हो, उसका मन संसार की किसी अन्य वस्तु में रम कैसे सकता है ? वह तो 'बिना मोल की चेरी' हो जाता है । लगता है आचार्यश्री भी इसी रोग के शिकार हो गये हैं -

इन नेननि बेंचि दयो मन मेरौ ।
रूप अनूप लुभाइ लालची नैकु कर्यौ नहिं झेरौ ॥
इहू उत जाय पाय सुख सारथी भयो जनम लौं चेरौ ।
प्रीति पुरातन जानि तनक हूँ मो तन कियो न फेरौ ॥
मोहिं अकेली जानि आनि कै मदन कियो है घेरौ ।
वृन्दावन प्रभु बिन अब निकसनकौं कहूँ न पैयतु सेरौ ॥

इसीलिए आचार्यचरण लोगों को सचेत कर देते हैं कि इन निगोड़े नेहियों की होड़ा-होड़ी कोई मत करना, महा कठिन पंथ है यह -

महा कठिन इह लगनि निगोड़ी ।
मत कोइ नेह फन्द मैं परियो, करि नेहिनकीहोड़ाहोड़ी ॥
चैन नैन देखै ही उपजत पलक ओट दुखपोटनि कोड़ी ।
वृन्दावन प्रभु जात न छोड़ी अब पहिलैजोड़ततोजोड़ी ॥

जिनको थोड़ा भी होश हवाश है, वे तो भूलकर भी इस मार्ग में पग न रखें । क्योंकि इसका मार्ग बड़ा बीहड़ है, कदाचित् साहस करके ऐसे लोग चल भी पड़ें, तो उन्हें उस 'वस्तु' की उपलब्धि नहीं हो सकती । इस निगोड़े पथ पर तो सफलता पूर्वक वे
ही चल सकते हैं जो अंधे हों और जिन पर 'कारे कन्हैया' की कृपा हो चुकी हो -

नेह निगौड़े को पैड़ोइ न्यारौ ।
जो कोइ होय कैं आंधौ चलै, सुलहै प्रिय वस्तु चहूँघा उजारौ ॥
सो तो इतै उत भूल्यौ फिरै, न लहै कछु जो कोउ होइ अँख्यारौ ।
वृन्दावन सोई याको पथिक है जापै कृपा करै कान्हर कारौ ॥

ऐसे निपट प्रेम के स्वरूप का परिचय देते हुए आचार्यश्री कहते हैं कि यह प्रेम-देश निराला है । यहाँ अपने सुख की कोई कीमत नहीं । प्रियतम का सुख ही अपना सुख है । प्रियतम के सुख के लिए हमें दुःख उठाना पड़े तो भी उसके सम्मुख अपने दुःख का नेंक भी प्रकाश नहीं होना चाहिए । विघ्न-बाधायें आहुति का कार्य करती हैं । नित नई उमंग, नित नया चाव । एक पलक का ओट भी कोटि-कोटि युग के सदृश प्रतीत होता है । सचमुच, नेही की गति तो कोई सिर कटा ही पा सकता है -

प्रेम कौ रूप सु इहै कहावै ।
प्रीतम कौ सुख सुख अपनौं दुख, वा हित होत न नैंक लखावै ॥
गुरुजन बरजन तरजन ज्यों ज्यों, रति नित नित अधिकावै ।
दुरजन घर घर करत विनिंदन, चन्दन सम सीतल सोउ भावे ॥
पलक ओट हू कोटि बरस सम, छिनक जोट सुख कोटि जनावै ।
वृन्दावन प्रभु नेही की गति, देही त्यागि घरै सोइ पावै ॥

इस गीतामृत-गंगा की कणिका-कणिका सरस है, सुखद है । प्रत्येक तरंग संगीत की गति से थिरकती है, हाव-भाव एवं गति-विलास से अपने भावों को अभिव्यक्त करने में पुर्ण समर्थ है । सहज ही इनमें 80 राग-रागनियों का समावेश हो गया है जिससे
स्पष्ट हो जाता है कि आचार्यश्री स्वयं एक उच्चकोटि के संगीतज्ञ थे । इसीलिए कविवर श्रीनागरीदास, घनानन्द जैसे उच्चकोटि के कवियों के काव्य-साधना एवं संगीत-आराधना इनके श्रीचरणों में ही हुई थी । दोनों ही इनके कृपापात्र थे । श्रीनिम्बार्क संप्रदाय के साहित्य-भंडार को इन्होंने और इनके शिष्यों ने इतना अधिक भर दिया कि आज भी यह गर्वोन्नत है ।
इसमें कुल 501 पद, 88 चौपाई, 72 दोहे हैं । व्रजभाषा के अतिरिक्त मैथिली, पंजाबी, बंगाली एवं राजस्थानी भाषा के पद भी सरस हैं । अलंकारों और मुहावरों का तो कहना ही क्या ! आचार्यश्री के हाथों में आकर वे भी कृतकृत्य हो गये हैं । लोकोक्तियां 'लोकरंजक' के सानिध्य से स्वयं ही चमत्कृत हो उठी हैं । अन्त में 'मधुरेण समापयेत्' के अनुरूप प्रियालाल की यह मनोहरि छवि अपने हृदय-पटल पर अंकित कर लें -

पिय प्यारे के संग हिंडोरैं झूलति मचकि मचकि ।
नील पीत पट फरहरात अरु, जात छीन कटि लचकि लचकि ॥
गावत राग मलार मधुर सुर, लेत तान अति हरषि हरषि ।
वृन्दावन प्रभु की छवि निरखत, गरजत घन वन बरषि बरषि ॥