जागर्ति दुन्दभिरवः परमोऽत्र “राधा वृन्दावने वन” इति प्रकटः पुराणे।
तस्या विधेयमसमोर्द्ध महानुराग मूर्ते स्तदंगनमपोह्य हरिं क्वपश्येः।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.22)
“श्रीराधा श्रीवृन्दावन में हैं” यह परम वाक्य रूप नगाड़ा (दुंदुभी ढोल) पुराणों में बज रहा है । यदि तू ऐसे वृंदावन धाम को त्याग देगा जो कि महा अनुराग की मूर्ति श्री राधा का निज महल है, तो तू श्री राधा के वशीभूत रहने वाले श्री हरि को फिर कहाँ पायेगा?
तस्या विधेयमसमोर्द्ध महानुराग मूर्ते स्तदंगनमपोह्य हरिं क्वपश्येः।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.22)
“श्रीराधा श्रीवृन्दावन में हैं” यह परम वाक्य रूप नगाड़ा (दुंदुभी ढोल) पुराणों में बज रहा है । यदि तू ऐसे वृंदावन धाम को त्याग देगा जो कि महा अनुराग की मूर्ति श्री राधा का निज महल है, तो तू श्री राधा के वशीभूत रहने वाले श्री हरि को फिर कहाँ पायेगा?

