रे मन करि श्रीवन अनुराग ॥ [1]
चौरासी लखि सीढ़ी चढ़ि बढ़ि महल टहल हित आयौ लाग ।
पतन भये पुनि जतन न पैये जनम जनम भूले भ्रमराग ॥ [2]
मीतपाय श्रीराधामाधव रिपु दल दल क्यों जात अभाग ।
श्रीराम राय भगवानदास सुन श्रीवृन्दावन छिन्हु न त्याग ॥ [3]
- श्री रामराय, आदिवाणी (93)
रे मन! श्री वृंदावन धाम से अनुराग कर । [1]
तूने 84 लाख योनियों को पार कर मनुष्य जन्म प्राप्त किया है, इसलिए महल की टहल (श्री राधा कि निज महल में सेवा) के लिए साधनारत हो । यदि इस मनुष्य जन्म में तेरा पतन हुआ तो फिर जनम-जनम के लिए संसार सागर में भूला हुआ भटकता रहेगा । [2]
अरे अभागे, तुझे श्री राधामाधव प्राप्त हुए हैं जो अधमों के मीत हैं, फिर क्यों संसार रूपी विषय-दलदल में धँसता जा रहा है । श्री रामराय कहते हैं, हे भगवान के दास, सुन! एक क्षण के लिए भी श्री वृंदावन का त्याग न करना ! [3]
चौरासी लखि सीढ़ी चढ़ि बढ़ि महल टहल हित आयौ लाग ।
पतन भये पुनि जतन न पैये जनम जनम भूले भ्रमराग ॥ [2]
मीतपाय श्रीराधामाधव रिपु दल दल क्यों जात अभाग ।
श्रीराम राय भगवानदास सुन श्रीवृन्दावन छिन्हु न त्याग ॥ [3]
- श्री रामराय, आदिवाणी (93)
रे मन! श्री वृंदावन धाम से अनुराग कर । [1]
तूने 84 लाख योनियों को पार कर मनुष्य जन्म प्राप्त किया है, इसलिए महल की टहल (श्री राधा कि निज महल में सेवा) के लिए साधनारत हो । यदि इस मनुष्य जन्म में तेरा पतन हुआ तो फिर जनम-जनम के लिए संसार सागर में भूला हुआ भटकता रहेगा । [2]
अरे अभागे, तुझे श्री राधामाधव प्राप्त हुए हैं जो अधमों के मीत हैं, फिर क्यों संसार रूपी विषय-दलदल में धँसता जा रहा है । श्री रामराय कहते हैं, हे भगवान के दास, सुन! एक क्षण के लिए भी श्री वृंदावन का त्याग न करना ! [3]

