सखि नँदलाल न आवन पावै - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (5)

सखि नँदलाल न आवन पावै - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (5)

(राग पीलू)
सखि नँदलाल न आवन पावै।
भीतर चरन धरन जिन दीजो, चाहे जिते ललचावैं ॥ [1]
ऐसनको बिस्वास कहा री कपट बैन बतियावैं ।
'नारायन' इक मेरे भवन तजि अनत चहे जहँ जावैं ॥ [2]

- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (5)

श्री राधारानी सखी से कहतीं हैं कि हे सखी, देखना नन्दलाल (श्री कृष्ण) आने न पायें । चाहे जितना तुम्हें अनुनय-विनय करें लेकिन मेरे महल के भीतर चरण रखने नहीं देना । [1]

ऐसे का क्या विश्वास करें, जो कपट की ही बात करता है । एक मेरे भवन के अतिरिक्त चाहे जहाँ जायें । [2]