जन्म :
श्री ललित किशोरी जी का जन्म लखनऊ में मिती कार्तिक कृष्णा में द्वितीय दिन सन 1825 में हुआ था। इनके पितामह शाह बिहारीलालजी उस समय लखनऊ में प्रसिद्ध धनाढ्य थे नवाबों से उनको “शाह" उपाधि प्राप्त थी। उनके ज्येष्ठ पुत्र शाह गोविंदलालजी की द्वितीय पत्नी के गर्भ से श्री ललित किशोरी जी का जन्म हुआ। इनका नाम शाह कुंदनलाल हुआ। इनके छोटे भाई का नाम शाह फुंदनलाल था।
बाल्यकाल एवं शिक्षा :
बाल्य काल में दोनों भाइयों को फारसी की शिक्षा दी गई। दोनों तीक्ष्ण बुद्धि सम्पन्न थे अतः शीघ्र ही फारसी में अच्छे प्रवीण हो गये। कुछ दिन तक श्री ललित किशोरी जी हिन्दी, पंजाबी, गुजराती, बांग्ला आदि भाषाएं पढ़ते रहे और उसमे भी प्रवीण हो गए।
प्रथम वृन्दावन आगमन :
श्री ललित किशोरी जी 1849 के लगभग श्रीधाम वृन्दावन दर्शनों को आये थे। श्री ललित किशोरी जी के पितामह शाह बिहारी लाल जी ने अपने इष्टदेव श्री राधारमण जी का नूतन मंदिर बनवाया था। जब से मंदिर बना तब से पितामह शाह बिहारी लाल जी उसे देखने को वृन्दावन नहीं आये थे। ये दोनों भाई बाल्यकाल से ही बड़े भक्त थे। इन सब विषयों में श्री ललित किशोरी जी की बड़ी अभिरुचि थी अतः इन्हीं को मंदिर देखने वृन्दावन भेजा गया। श्री ललित किशोरी जी श्री राधारमण जी के लिये एक सुवर्ण सिंहासन बनवाकर लाये थे। इनको वृन्दावन स्थान बड़ा सुन्दर लगा और इनकी इच्छा यहीं रहने की हुई, किन्तु उस समय ऐसा असंभव था, उस समय तक इनके पितामह इत्यादि जीवित थे। श्री ललित किशोरी जी ने भी अवसर न समझ कर इसकी चेष्टा न की। श्री ललित किशोरी जी लगभग एक मास समस्त ब्रजभर में भ्रमण कर लखनऊ लौट गये।
वृन्दावन से लखनऊ लौटना और पितामह, पिता एवं माता का स्वर्ग सिधारना :
श्री ललित किशोरी जी वृन्दावन से चले तो गये किन्तु लखनऊ जाकर बराबर अवसर ढूंडने लगे कि कब वृन्दावन जाऊं। कुछ दिन बाद श्री ललित किशोरी जी के पितामह और उनके एक वर्ष बाद ही इनके पिता का भी देहांत हो गया। पिता की मृत्यु के दो तीन मास बाद ही इनकी पुत्रवत्सला माता स्वर्ग को सिधार गई। इन-आकस्मिक तीन-तीन घटनाओं से श्री ललित किशोरी जी का मन बड़ा अशान्त रहने लगा, इनके पिता और पितामह के अभाव से इनका परिवार बड़ा उच्छृंकल सा हो गया। परिवार की ओर से श्री ललित किशोरी जी को अनेक कष्ट दिये जाने लगे। यहां तक कि कष्ट असह्य हो उठा किन्तु श्री ललित किशोरी जी बाल्य काल से ही बड़े सहनशील थे, श्रीजी की सेवा करते थे, सारा दिन सेवा और भगवद् भजन में व्यतीत करते थे इन कारणों से ये उन सब कष्टों की कुछ पर्वाह नहीं करते थे।
श्री राधा गोविंद गोस्वामी का लखनऊ पधारना और श्री राधारमण जी का ब्रजवास के लिए आदेश :
इसी समय वृन्दावन से श्री ललित किशोरी जी के गुरु श्री राधा गोविंद गोस्वामी लखनऊ पधारे। उनके आने से श्री ललित किशोरी जी की चित्त वृत्तियां दूसरी ओर लग गई, गुरु से इन्होने बहुत सी शिक्षायें ग्रहण कीं और श्री गोपाल चम्पू ग्रन्थ श्रवण किया। जब गुरु वृन्दावन वापिस जाने लगे तो श्री ललित किशोरी जी ने निजसेव्य श्री राधारमण जी का विग्रह उनके साथ वृन्दावन भेज दिया और कहा कि अपनी देख रेख में इनकी सेवा पूजा का प्रबंध करा दीजियेगा, हम शीघ्र वृन्दावन आकर अपना निवास स्थान निर्माण करेंगे। एक दिन श्री ललित किशोरी जी के श्री विग्रह ने इनको आदेश किया कि तुम श्री वृन्दावन आ जाओ और निधिवन के पास ही मेरा निवास स्थान निर्माण कराओ। शाहजी साहब ने उसी समय एक पद रचना की।
वृन्दावन को जाना हेली वृन्दावन को जाना है।
रसिकरंगीले राधामोहन तिनसों दिल लहिराना है॥
ललितकिशोरी ने दृढ़कर अब येही मनमें ठाना है।
ललितलता निधुवन के निचे ह्वाँईं ठीक ठिकाना है॥
- अभिलाष माधुरी, मन शिक्षा (288)
श्री ललित किशोरी जी के भ्राता शाह फुंदनलाल जी इनके निर्मित पद संग्रह करते जाते थे। श्री ललित किशोरी जी का मन जब वृन्दावन जाने को अत्यन्त विचलित हुआ तो इन्होने न्यायालय की शरण लेकर सब संपत्ति बाँट ली। इस झगड़े में श्री ललित किशोरी जी को कई बार कलकत्ते, कानपुर आदि स्थानों पर जाना पड़ा था। किन्तु इनका काम बराबर चलता रहा और ये नित्य प्रति अभिलाष माधुरी की रचना करते रहे।
श्री ललित किशोरी जी का अपने भाई शाह फुंदनलाल के संग वृन्दावन आना :
अंत में 1855 चैत्र कृष्णा में दोनों भाइयों ने वृन्दावन को प्रयाण किया। उन दिनों वृन्दावनके मार्गमें लुटेरोंका बहुत भय था। ललितकिशोरी जी को राधारमणजी के आदेशानुसार एक विशाल मन्दिरके निर्माण के लिए पर्याप्त धन लेकर वृन्दावन जाना था। इसलिये 1856 वैशाख शुक्ला 13 को दोनों भाई रक्षाके लिए 4000 शस्त्रधारी सिपाहियोंकी सेना साथ लेकर वृन्दावनको चल पड़े। इन्होंने श्री राधारमण जी के मंदिर के समीप पटनीमल वाली कुंज में निवास करना प्रारंभ किया। इनके साथ के सेवक कुछ इनके पास रहे बाकी सब सेवकों के लिये यमुना किनारे बड़े-बड़े तम्बुओं में रहने का प्रबंध कर दिया गया।
वृन्दावन में रहनी :
यहां से श्री ललित किशोरी जी का नैष्ठिक जीवन प्रारंभ हुआ। ये वृन्दावन में कभी जूता या चप्पल कुछ नहीं पहनते थे। आराम की कोई चीज़ पास नहीं रखते थे। श्री धाम में इनकी ऐसी अप्रतिम निष्ठा थी कि वृन्दावन आने के बाद ये कभी वृन्दावन की सीमा के बाहर न गये। यहां तक इनकी आज्ञा थी कि हमारा चित्र भी कभी वृन्दावन के बाहर न भेजा जाय। लखनऊ में श्री ललित किशोरी जी हुक्का पीते थे लेकिन जब ये वृन्दावन आये तब ब्रज की सीमा के बाहर कहीं उन्होंने डेरा डाला, वहां इनके लिये हुक्का लगाया गया, उसे देख कर श्री ललित किशोरी जी ने उस हुक्के में एक लात मारी और ब्रज की सीमा को प्रणाम कर नंगे पांव ब्रज में प्रवेश किया। तब से इन्होंने कभी हुक्के का नाम भी नहीं लिया।
श्री ललित किशोरी जी का वृन्दावन का आक्रमणकारियों से रक्षा करना :
किन्तु श्री ललित किशोरी जी को एक बार वृन्दावन से बाहर जाना पड़ा था। ब्रज की सीमा के बाहर तब भी नही गये, यह भी बड़ी विचित्र कथा है। 1857 में जब देश व्यापी राष्ट्र विप्लव हुआ तब वृन्दावन भी इस आपत्ति से न बच सका। ठाकुर हीरासिंह की अध्यक्षता में विप्लवकारियों का एक दल वृन्दावन को लूटने आया, श्री ललित किशोरी जी के पास पर्याप्त सेना और अस्त्र शस्त्र थे और ये अपना सैन्य बल लेकर वृन्दावन की रक्षा के निमित्त आ डटे, इघर इनके अन्तःपुर से पुत्र जन्म का शुभ संदेश आया। सेना ने बन्दूक दागने आरंभ कर दिये। श्री ललित किशोरी जी का असाधारण सैन्यबल देखकर विप्लवकारियों की हिम्मत टूट गई और वे सब कई दिन के भूखे भी थे, अतः उन्होंने शाहजी की शरण ली। शाहजी ने भी शरणागत वत्सलता का परिचय देकर तीन दिन तक भोजनादि से उन सब का पालन किया। चलते समय हीरासिंह ने कहा कि शाहजी आपके पास जो कुछ बहु मूल्य वस्तु हो हमें दे दीजिये, हम ब्रज में कहीं भी लूट मार नहीं करेंगे। शाहजी साहब ने अच्छा कहकर अपना संदूक मंगाया, उसमें श्री राधाकृष्ण का अत्यन्त सुन्दर एक चित्र और चरणामृत की गोली रहती थी, शाहजी ने वह निकाल कर हीरासिंह को दीं और कहा कि इन दोनों चीजों से बढ़कर अमूल्य वस्तु हमारे पास कुछ नहीं है। वह चित्र ऐसा सुन्दर और भाव पूर्ण था कि लूटेरे का हृदय मी गद्गद् हो गया। श्री चैतन्य चरितामृत का कथन है की "यदि अच्छे सत्पुरुष का एक क्षण भी सङ्ग हो जाय तो मनुष्य को कृष्ण भक्ति प्राप्त हो जाती है", हीरासिंह तो तीन दिन तक भकशिरोमणि शाहजी साहब के आश्रय रहे, यदि हीरासिंह के मनमें ऐसा भाव आ गया तो क्या आश्चर्य है। हीरासिंह की आंखों में आंसू आ गये और शाहजी साहब से कहा कि यह चित्र हमको दे दिया जाय। शाहजी साहब ने वह चित्र उन्हें दे दिया, वे चुपचाप दोनों चीज़ लेकर चले गये। इस प्रकार श्री ललित किशोरी जी ने ब्रज की रक्षा की।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा श्री ललित किशोरी जी के लिए वारंट जारी करना :
इधर जब पुनः शांति स्थापित हो गई, तब सुप्रीम कोर्ट से शाह कुंदनलाल (श्री ललित किशोरी जी) के नाम वारण्ट निकला। यह सुनकर श्री ललित किशोरी जी किंचित् भी विचलित न हुए। जब मैजिस्ट्रेट के यहां तलब किये गये, अदालत के नियमानुसार हलफ़ इत्यादि होने के बाद आपकी इस प्रकार बातें प्रारंभ हुई।
मैजिस्ट्रेट - कुछ बागी तुम्हारे घर रहा था ?
शाहजी - जी नहीं, ब्रज में रहे।
मैजिस्ट्रेट - कितना रोज़ ?
शाहजी - तीन दिन।
मैजिस्ट्रेट - तुमने सरकार के बागियों को इम्दाद क्यों दी ?
शाहजी - जी नहीं इसको इम्दाद नहीं कहते, मैंने ब्रज की रक्षा के लिये और मार काट न हो इसलिये उन्हें सामदाम से ही वशकर लेने की इच्छा की थी। जब वे मेरी शरण स्वयं आये थे तो मेरा धर्म था कि मैं उन्हें किसी प्रकार कष्ट न दूं, मैंने ब्रज की रक्षा कर आपही के कर्त्तव्य का पालन किया, जो कार्य आप करते वह मैंने किया।
मैजिस्ट्रेट - वैल, कुंदनलाल तुम जानता है कि बागियों को इम्दाद देने वाले को क्या सज़ा दी जाती है ?
शाहजी - आप शक्तिशाली हैं, सभी सज़ा दे सकते हैं। मृत्यु पर्यन्त की सज़ा दे सकते हैं इससे ज्यादा नहीं।
मैजिस्ट्रेट - (झुँझलाकर) अच्छा तुमको यही सज़ा देगा तुमको फांसी दिया जायगा।
शाहजी - जो आज्ञा किन्तु एक प्रार्थना है मनुष्यत्व के नाते हम आपसे एक अनुरोध करते हैं कि हमको फांसी वृन्दावन में दी जाय और फांसी के समय हमारे चारों ओर श्री हरिनाम संकीर्तन हो भगवान के नाम के सिवाय हम और कुछ नहीं सुनना चाहते हैं ऐसी फांसी हमको सज़ा नहीं इनाम होगी।
मैजिस्ट्रेट - मालुम होता है तुम एक Religious man (धार्मिक मनुष्य) है ? हम जानता है तुम्हारे धरम की किताब में लिखा है कि राजा रैयत का बाप होता है, रैयत को भी उसे बाप की बराबर मानना चाहिये।
शाहजी - हाँ, मैं राजा को बराबर पिता के तुल्य मानता था, मानता हूँ और आगे भी मानता रहूँगा।
मैजिस्ट्रेट - टुम को टो अभी फांसी होगा आगे कैसे मानता रहेगा। क्या तुम आगे जीटा रहेगा।
शाहजी - जब तक राजा अपने कर्तव्य से नावाकिफ थे तब तक मुझे आपसे भय था, जब राजा अपने कर्तव्य समझ गये अर्थात् प्रजा को पुत्र की तरह मानने लगे तो मुझे आपसे कोई डर नहीं है। अगर पिता नाराज होकर संतान को कोई दण्ड भी दे तो उसके अच्छे के ही लिये दण्ड देता है। पिता की ओर से पुत्र को कोई नुकसान नहीं हो सकता।
इनके इन बुद्धिमत्ता पूर्ण वचनों को सुनकर मैजिस्ट्रेट द्विविधा में पड़ गया। कुछ देर विचार करने पर इनको छोड़ देना ही उचित समझा अतः मैजिस्ट्रेट ने श्री ललित किशोरी जी को बरी कर दिया। श्री ललित किशोरी जी संकीर्तन करते-करते नाव द्वारा फिर वृन्दावन वापस आ गये।
श्री ललित किशोरी जी का वृन्दावन से प्रेम :
वृन्दावन को श्री ललित किशोरी जी अत्यन्त श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। ब्रज रज में कभी मलमूत्र त्याग नहीं करते थे। इनके मलमूत्र त्याग करने के स्थान पर आगरे से मिट्टी मंगवाकर बिछाई जाती थी। आगरे के ही बने कुंडे में मलमूत्र त्याग करते थे। वे कुंडे ब्रज की सीमा के बाहर फेंके जाते थे।
श्री ललित किशोरी जी का रासलीला आयोजन करवाना :
श्री ललित किशोरी जी ने श्री राधाकृष्ण की लीलायें पद्य में प्रणयन की। इनकी इच्छा उन लीलाओं के प्रत्यक्ष दर्शन करने की हुई एतदर्थ इन्होंने प्राय: 3-4 लाख रुपया व्यय कर रासलीला का आयोजन किया। रासलीलाओंमें उनकी विशेष रुचि थी। रासलीलाके पदोंकी रचना वे स्वयं करते थे। रासधारियों और रासके स्वरूपोंको गान, नृत्य और अभिनयकी शिक्षा भी स्वयं देते थे।
श्री ललित निकुंज (शाहजी का मंदिर) का निर्माण करवाना :
1860 माघ शुक्ला 5 से श्री ललित किशोरी जी ने अपने निवास स्थान का निर्माण का कार्य प्रारंभ कराया। यह सँगमरमर का अत्यन्त विशाल भवन (वर्त्तमान 'शाहजी का मंदिर') आठ वर्ष में बनकर तयार हुआ। श्री ललित किशोरी जी ने अपने उस भजन कुटीर का नाम "श्री ललित निकुंज" रखा। 1868 माघ शु० 5 को अत्यन्त सामारोह के साथ श्री ललित किशोरी जी नित्य निज सेव्य श्री राधारमणजी का विग्रह इस नूतनभवन में ले गये। इनका शेष जीवन बड़ी शांति और आनंद से व्यतीत हुआ।
रचना :
श्री ललित किशोरी जी के अनेक पद प्राप्त होते हैं। इन्होने विनय, वृन्दावन शतक, शिक्षा, मनः शिक्षा, फुटकर पद, ग़ज़ल आदि की रचना की है जो 'अभिलाष माधुरी' नामक ग्रन्थ में संकलित है।
महाप्रयाण :
1873 में दशहरे के बाद से इनको फसली बुखार हुआ। दस बारह दिन में कमजोरी के सिवाय इनके शरीर में कुछ रोग शेष नहीं रहा। कार्तिक शु० 1 के दिन इनको ज्ञात हो गया कि हमारी जो बहुत दिन से अभिलाषा थी कि श्री वृन्दावन की रज में श्री युगलनाम संकीर्तन करते-करते हम इस नश्वर देह को त्याग करें उसके पूर्ण होने का समय निकट है। अतएव इन्होंने उस दिन आतुर सन्यास लिया और परमार्थ विषय के बहुत से उपदेश याद किये। उस दिन से कमजोरी कुछ-कुछ बढ़ने लगी। सबेरे बृहस्पतिवार द्वतिया को इनके लघुभ्राता शाह फुंदनलाल जी ने इनकी कमज़ोरी देखकर इनसे चिकित्सा के लिए निवेदन किया। लेकिन अपना समय निकट जानकार ये बड़े आनंदित होकर बोले "बड़ी अच्छी बात है, रज का चबूतरा तैयार कराओ।" यह कहकर श्री ललित किशोरी जी अपने नित्य नियम में लग गये। इधर छोटे शाहजी ने यमुनाजी की कोमल स्वच्छ बालू को छनवाकर एक चबूतरा तैयार कराया और श्री ललित किशोरी जी का पलंग उसके समीप ले गये। श्री ललित किशोरी जी चबूतरा देखकर अत्यन्त हर्षित हुये मानों चक्रवर्ती राज्य का सिंहासन मिल गया हो। झट उसपर विराजमान होकर इन्होंने आज्ञा की कि संकीर्तन प्रारंभ करो और हमारे परिचर्या के 9 आदमियों के सिवाय किसी को यहां मत आने दो। छोटे शाहजी साहब ने इनकी आज्ञानुसार संकीर्तन प्रारंभ किया। इस समय छोटे शाहजी का धैर्य प्रशंसनीय था, ये स्वयं तो वीर थे ही औरों को भी धैर्य बँधाते जाते थे और शाहजी साहब को श्री राधेश्याम नाम सुना रहे थे। शाहजी साहब के तीन ओर तीन चित्र श्री राधारमण जी के लगाये गये। एक दाहिनी ओर एक बाईं ओर और एक सामने जिधर दृष्टि जाय श्रीजी के ही दर्शन हों। शाहजी साहब भी धीरे धीरे महीन स्वर में नाम ले रहे थे।
दिन के 2 बजे श्री ललित किशोरी जी ने एक पद रचना कर पढ़ा।
वृन्दावन अवनी अली करो राधिका सोर।
गली गली छुट राधिका नाम न दूजौ घोर॥
नाम न दूजौ घोर ओर दश हूं रँग रांचे।
जल थल पातन पात सोर राधा धुनि माचै॥
एसौ बनै समाज सदा रहिहों जग जिन्दा।
ललितकिशोरी प्रान जाउठेंगे वन विन्दा॥
इस समय श्री ललित किशोरी जी का देह एक दम प्रफुल्लित हो उठा। इनका ऐसा गुलाब का सा चेहरा कभी निरोग अवस्था में भी नहीं देखा गया था। ये कभी चित्रों के चरण छूकर माथे से लगाते थे कभी नृत्य का भाव करते थे। कभी हाथ उठाकर कीर्तन करते थे कभी हाथ फैलाकर चित्रों की ओर इस प्रकार बढ़ते थे मानो श्रीजी की छवि को अपने हृदय में ले लेंगे या आप ही इन चित्रों में लीन हो जायंगे। दिन के करीब 3 बजे इन्होंने मुस्कराकर चार बार जल्दी जल्दी राधेश्याम नाम लिया और एक टक लगाकर चित्रों के दर्शन करते-करते इस नश्वर देह को त्याग कर श्रीजी के चरणों में लीन हो गए।
अंतिम यात्रा एवं समाधी :
श्री ललित किशोरी जी का वियोग समाचार बिजली की तरह चारों ओर फैल गया। दूर दूर से लोग आने लगे। इनकी देह यात्रा बड़ी विचित्र प्रकार से हुई। वृन्दावन की सड़कों पर कोमल बालू श्री यमुनाजी की बिछाई गई। उस पर से इनको ले जाया गया। इनके शरीर पर सिंदूरी रंग की गाथी बंधी हुई थी मानों कोई युवती सन्यासनी हो। चेहरे पर वही अंतिम समय की मुसक्यान थी। चरणों में कोमल कपड़े बांध कर हज़ारों आदमी श्री ललित किशोरी जी को ठहरते ठहरते ले जा रहे थे। पीछे पीछे हजारों आदमी रज में लोटते नाचते कीर्तन करते आ रहे थे। सब लोग उनके चरण छूकर अपने बालकों के माथे से लगाते थे। प्रधान-प्रधान मंदिरों के द्वार पर इन्हें ठहराया गया जहाँ श्रीजी की ओर से प्रसादी दुपट्टा माला और प्रसाद से इनका सम्मान हुआ। प्रसाद इनके मुख में दिया गया, दुपट्टा उढ़ा दिया गया। वहां से चलकर श्री युगल वाटिका में इनको समाधिस्थ किया गया। यह स्थान निधिवन से कुछ दूर था किन्तु श्री ललित किशोरी जी अपना स्थान निधिवन के पास ही निर्दिष्ट कर चुके थे। इसलिये कुछ दिन बाद इनकी समाधि वहां से ले जा कर नये भवन के चंदपोल नामक द्वार पर जो निधिवन के अति समीप है लगाई गई। आज भी दोनों भ्राता द्वार के दोनों ओर जय विजय की तरह समाधिस्थ हैं।

