मानक महल में बिराजैं राज राजेस्वरी,
चार दस लोकन की उपमा लजानी की। [1]
आस पास दासी खासी करत खवासी केती,
कोऊ जलदान इत्र दान पानदानी की॥ [2]
'लाल बलबीर' द्वार भारती भमानी रानी,
अस्तुति सुनावैं हरषावैं वेद बानी की। [3]
केती सुखदानी देवरानी यहाँ आय आय,
आरती उतार्यौ करैं राधे महारानी की॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (8)
माणिक्य के दिव्य महल में परम राजराजेश्वरी श्री राधा महारानी विराजमान हैं, जिनकी महिमा के समक्ष चौदहों लोकों की उपमाएँ भी संकुचित होकर लज्जित प्रतीत होती हैं। [1]
उनके आस-पास असंख्य दासियाँ सेवा में तत्पर खड़ी हैं—कोई जलपात्र लिए हुए है, कोई इत्रदान लिए, तो कोई पानदान लेकर विनम्रतापूर्वक उपस्थित है। [2]
श्री लाल बलबीर कहते हैं कि उस महल के द्वार पर स्वयं देवी सरस्वती और देवी पार्वती उपस्थित होकर वेदों की दिव्य वाणी में श्री राधा की स्तुति कर रही हैं और उनकी महिमा गाते हुए आनंदमग्न हो रही हैं। [3]
श्री राधा को आनंद और सुख प्रदान करने के लिए अनेक देवपत्नियाँ यहाँ उपस्थित होकर भक्ति-भाव से उनकी आरती उतार रही हैं, मानो स्वयं को धन्य कर रही हों। [4]
चार दस लोकन की उपमा लजानी की। [1]
आस पास दासी खासी करत खवासी केती,
कोऊ जलदान इत्र दान पानदानी की॥ [2]
'लाल बलबीर' द्वार भारती भमानी रानी,
अस्तुति सुनावैं हरषावैं वेद बानी की। [3]
केती सुखदानी देवरानी यहाँ आय आय,
आरती उतार्यौ करैं राधे महारानी की॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (8)
माणिक्य के दिव्य महल में परम राजराजेश्वरी श्री राधा महारानी विराजमान हैं, जिनकी महिमा के समक्ष चौदहों लोकों की उपमाएँ भी संकुचित होकर लज्जित प्रतीत होती हैं। [1]
उनके आस-पास असंख्य दासियाँ सेवा में तत्पर खड़ी हैं—कोई जलपात्र लिए हुए है, कोई इत्रदान लिए, तो कोई पानदान लेकर विनम्रतापूर्वक उपस्थित है। [2]
श्री लाल बलबीर कहते हैं कि उस महल के द्वार पर स्वयं देवी सरस्वती और देवी पार्वती उपस्थित होकर वेदों की दिव्य वाणी में श्री राधा की स्तुति कर रही हैं और उनकी महिमा गाते हुए आनंदमग्न हो रही हैं। [3]
श्री राधा को आनंद और सुख प्रदान करने के लिए अनेक देवपत्नियाँ यहाँ उपस्थित होकर भक्ति-भाव से उनकी आरती उतार रही हैं, मानो स्वयं को धन्य कर रही हों। [4]

