वृन्दावने चारु बृहद्वने मन्मनोरथं पूरय सूरसूते ।
दृग्गोचरः कृष्ण विहार एव स्थितिस्त्वदीये तट एव भूयात् ॥
- श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), यमुनाष्टपदी (अंतिम श्लोक)
हे सूर्यपुत्री यमुना जी! मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप वृंदावन धाम में ही मेरा मनोरथ पूर्ण करें, जहाँ यमुना तट पर श्री कृष्ण का नित्य विहार दृष्टिगोचर होता है ।
दृग्गोचरः कृष्ण विहार एव स्थितिस्त्वदीये तट एव भूयात् ॥
- श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), यमुनाष्टपदी (अंतिम श्लोक)
हे सूर्यपुत्री यमुना जी! मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप वृंदावन धाम में ही मेरा मनोरथ पूर्ण करें, जहाँ यमुना तट पर श्री कृष्ण का नित्य विहार दृष्टिगोचर होता है ।

