हिंडोरैं झूलत राधा प्यारी - श्री वंशी अली जी, वर्षोत्सव, हिंडोला (6)

हिंडोरैं झूलत राधा प्यारी - श्री वंशी अली जी, वर्षोत्सव, हिंडोला (6)

हिंडोरैं झूलत राधा प्यारी ।
गोरे मुष पहिरै कुसुंभी सारी ।। [1]
फूली साँझ जुत चंद बिराजत ।
बादर रेष सी केस-पास तामैं रवि की किरनि किनारी ।। [2]
ताही ढिंग मानौं उदय उडगन होत ऐसैं ताटंक विदुली सँवारी ।
छवि निरषत वंशीअलि रीझि रही देत प्रान-धन वारी ।। [3]

- श्री वंशी अली जी, वर्षोत्सव, हिंडोला (6)

श्री राधा प्यारी हिंडोरा (झूला) झूल रही हैं । उनका मुख कमल गोरा है एवं उन्होंने कुसुंभी (केसरिया) रंग की साड़ी धारण किया है । [1]

श्री राधा इस प्रकार प्रफुल्लित प्रतीत हो रही हैं मानो रात्री में उज्जवल चंद्र विराजमान है । श्री राधा के केश-पाश मेघ वर्ण के हैं जिसके किनारे सूर्य के किरणों जैसे चमक रहे हैं । [2]

उनके कर्ण में झूलते कुण्डल ऐसे सुशोभित हो रहे हैं जैसे तारों का समूह एक संग उदय हो गया है । श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि श्री राधा कि इस छवि का दर्शन कर मैं अपने प्राण-धन न्योंछावर कर दे रहा हूँ । [3]