हे वृन्दाटवि मोहि अपनैयै ।
तुम ही विजैरूप राधे कौ,
और कौन कौं बिनै सुनैयै ॥ [1]
जननी सम औगुन तजि सिसु कौं,
करुणा करि निज गोद बसैयै ।
तुम बिन अली किशोरी क्यौं हू,
और ठाँह सुख नाहिंन पैयै ॥ [2]
- श्री किशोरी अलि जी, विनय के पद (24)
हे वृन्दावन, मुझे कृपाकर अपनाओ ! तुम ही श्री राधा का प्रकट रूप हो, और किसे अपनी प्रार्थना सुनाऊँ ? [1]
माता के अतिरिक्त एक शिशु के अवगुणों को कौन त्याग करवा सकता है, अत: हे वृंदावन, उस माता की तरह ही मुझे करुणापूर्वक अपनी गोद में बसा लीजिये । श्री किशोरी अलि जी कहते हैं कि हे वृन्दावन, तुम्हारे अतिरिक्त अब किसी अन्य ठौर मुझे सुख प्राप्त नहीं होगा । [2]
तुम ही विजैरूप राधे कौ,
और कौन कौं बिनै सुनैयै ॥ [1]
जननी सम औगुन तजि सिसु कौं,
करुणा करि निज गोद बसैयै ।
तुम बिन अली किशोरी क्यौं हू,
और ठाँह सुख नाहिंन पैयै ॥ [2]
- श्री किशोरी अलि जी, विनय के पद (24)
हे वृन्दावन, मुझे कृपाकर अपनाओ ! तुम ही श्री राधा का प्रकट रूप हो, और किसे अपनी प्रार्थना सुनाऊँ ? [1]
माता के अतिरिक्त एक शिशु के अवगुणों को कौन त्याग करवा सकता है, अत: हे वृंदावन, उस माता की तरह ही मुझे करुणापूर्वक अपनी गोद में बसा लीजिये । श्री किशोरी अलि जी कहते हैं कि हे वृन्दावन, तुम्हारे अतिरिक्त अब किसी अन्य ठौर मुझे सुख प्राप्त नहीं होगा । [2]

