प्रेमरंग-रस-रगमगी, सुंदर ब्रजबन-भूमि - श्री आनंदघन, घनानंद ग्रंथावली, ब्रजविलास (9)

प्रेमरंग-रस-रगमगी, सुंदर ब्रजबन-भूमि - श्री आनंदघन, घनानंद ग्रंथावली, ब्रजविलास (9)

प्रेमरंग-रस-रगमगी, सुंदर ब्रजबन-भूमि ।
ब्रजजीवन आनंदघन, हित बरसत नित झूमि ॥

- श्री आनंदघन, घनानंद ग्रंथावली, ब्रजविलास (9)

ब्रज-वृन्दावन की यह सुंदर भूमि प्रेम के रंगों और दिव्य रस से पूरी तरह सराबोर है। यहाँ ब्रज के जीवन-प्राण, आनंद के मेघ (श्री कृष्ण), नित्य-निरंतर झूमते हुए प्रेम-रस की वर्षा करते रहते हैं।