मदनगुपाल सरन तेरी आयौ - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (1)

मदनगुपाल सरन तेरी आयौ - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (1)

(दोहा)
चरण कमल की दीजिये, सेवा सहज रसाल।
घर जायौ मुहि जानिकें, चेरौ मदन गुपाल॥


(पद) [राग गौरी, इकताल]
मदनगुपाल सरन तेरी आयौ।
चरन कमल की सेवा दीजै, चेरौ करि राषौ घर जायौ॥ [1]
धनि धनि मात-पिता सुत बंधू, धनि जननी जिन गोद खिलायौ।
धनि-धनि चरन चलत तीरथ कौं, धनि गुरु जिन हरि नाम सुनायौ॥ [2]
जे नर विमुष भये गोबिंद सौं, जनम अनेक महा दुष पायौ।
श्रीभट के प्रभु दियौ अभै पद, जम डरप्यौ जब दास कहायौ॥ [3]

- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (1)

(दोहा)
हे मदनगोपाल! इस जीव को अपना निजी दास मानकर अपने श्रीचरण-कमलों की सहज, स्वाभाविक और रसमयी सेवा प्रदान कीजिये, तथा मुझे सदैव अपनी ही शरण में रखिये।

(पद)
हे मदनगोपाल ! यह जीव आपकी शरण में आया है। इसे अपना घरजाया चेरा जान अपने चरणकमल की सहज स्वाभाविक रसमयी सेवा प्रदान कर अपनी ही शरण में रख लीजिए। [1]

वे माता, पिता, बन्धु-जन आदि सभी धन्य हैं जो प्रभु के शरणागत के प्रति पुत्रत्व, भ्रातृत्व आदि का भाव रखते हैं। वह जन्मदात्री माता भी कृतकृत्य है जो ऐसे बड़भागीजनों को जन्म देकर अपनी गोद में खिलाती हैं। वे चरण धन्य हैं जो चलकर तीर्थ में पहुँचते हैं। जो ऐसे शरणागत को भगवन्नाम-श्रवण कराते हैं, वे परम-गुरु भी धन्य हैं। [2]

जो गोविन्द से विमुख हैं वे जन्म-जन्मान्तर महान् दुःख पाते हैं और गोविंद की पूर्ण रूप से शरण ग्रहण कर लेने पर प्रभु उन्हें अभय पद दे देते हैं; फिर श्री हरि के दास कहाने के कारण साक्षात् यम भी उससे भयभीत होने लगता है। [3]