को अवराधे जोग तुव, रहु रे मधुकर मौन - श्री रस निधि जी

को अवराधे जोग तुव, रहु रे मधुकर मौन - श्री रस निधि जी

को अवराधे जोग तुव, रहु रे मधुकर मौन।
पीतांबर के छोर तैं, छोर सकैं मन कौन॥

- श्री रसनिधि जी

गोपियाँ कहती हैं — "हे मधुकर (उद्धव)! तुम चुप हो जाओ, तुम्हारे इस योग (निर्गुण उपासना) की आराधना भला यहाँ (प्रेम भूमि ब्रज में) कौन करेगा? जिनके मन श्री कृष्ण के पीतांबर के छोर (पल्लू) से बँध चुके हैं, भला उन मनों को वहाँ से छुड़ाकर कौन कहीं और लगा सकता है?"