लिखन्ति भुजमूलतो न खलु शंख-चक्रादिकं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (81)

लिखन्ति भुजमूलतो न खलु शंख-चक्रादिकं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (81)

लिखन्ति भुजमूलतो न खलु शंख-चक्रादिकं विचित्र हरिमन्दिरं न रचयन्ति भालस्थले ।
लसत्तुलसि मालिकां दधति कण्ठपीठे न वा गुरोर्भजन - विक्रमात्क इह ते महाबुद्धयः ॥

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (81)

श्री गुरु द्वारा दिए गए भजन के पराक्रम से युक्त वे कोई महाबुद्धिमान विरले ही अनन्य रसिक जन हैं, जो न तो भुजाओं में शंख चक्र आदि वैष्णव चिन्हों को धारण करते हैं, और न ही कभी ललाट पर वैष्णव तिलक आदि रचते हैं, और न ही अपने कंठ में सुहावनी तुलसी माला को धारण करते हैं । उन्हें तो इन सब बाहरी लक्षणों की सुधि ही नहीं, वे किसी अंतरंग राधा रस में डूबे हुए हैं ।