श्री रामराय जी की जीवनी

श्री रामराय जी की जीवनी

जन्म :
भक्तमाल में श्रीनाभाजी वर्णन करते हैं - 
विप्र सारस्वत घर जनम श्रीरामराय हरि रति करी ।
भक्तिज्ञान वैराग योग अन्तर गति पागे ।
काम क्रोध मद लोभ मोह मत्सर सब त्यागे ॥
कथा कीर्तन मगन सदा आनंद रस झूले ।
सन्त निरखि मन मुदित उदित रवि पंकज फूले ॥
वैरभाव जिन द्रोह किय तासु पाग खिसि भुविपरी ।
विप्र सारस्वत घर जनम श्रीरामराय हरि रति करी ॥
- भक्तमाल (196)

श्री रामराय जी का प्राकट्य रावी नदी के तट पर बसे लाहौर नगरी में सारस्वत ब्राह्मण कुल में 1483 वैशाख शुक्ल 11 को मध्यान काल में हुआ । इनके पिता का नाम श्री गुरुगोपाल सारस्वत एवं माता का नाम श्री यशोमति था । पिता ने इनका नाम रामराय रखा । इनके छोटे भ्राता का नाम श्री चंद्रगोपाल था जिन्हें संतगण चित्रा सखी का अवतार कहते हैं । 
श्री रामराय जी गीतगोविन्द के रचयता श्री जयदेव गोस्वामी जी के वंश परंपरा में ग्यारहवीं पीढ़ी में प्रकट हुए थे ।
इनके घर में श्री जयदेव गोस्वामी के आराध्य श्री राधामाधव जी वंश परंपरा अनुसार विराजमान थे एवं समस्त परिवार उनकी सेवा करता था । 

बाल्यकाल :
श्री रामराय जी जन्म से ही विलक्षण थे । ग्यारह वर्ष की अवस्था में पिता ने इनका यज्ञोपवीत संस्कार किया एवं इन्हें गायत्री मन्त्र प्रदान किया । पिता ने इनको समस्त शास्त्रों की शिक्षा दी । 
श्री रामराय जी के घर पर प्रत्येक वर्ष श्री जयदेव गोस्वामी जी का प्राकट्योत्सव मनाया जाता था । जब ये बारह वर्ष के थे, तब विशेष रूप से प्राकट्योत्सव का आयोजन किया गया । उत्सव में 200-300 प्रसाद पाने आते थे, इस कारण इस वर्ष भी इतने ही भक्तों का प्रसाद बना । लेकिन अचानक 1000 ब्राह्मण उत्सव में आ गए । ब्राह्मणों के देख पिता गुरुगोपाल जी प्रसन्न हुए, लेकिन मन में चिंता करने लगे की इतने ब्राह्मणों के प्रसाद की व्यवस्था कैसे संभव है । बारह वर्ष के श्री रामराय जी ने पिता को चिंताग्रस्त देखा तो उनके पास आये, प्रणाम किया और कहा "पिता जी, आप चिंता न करें, हमारे घर में श्री राधामाधव विराजमान हैं, उनका प्रसाद चिन्मय एवं अनंत है, इसलिए सबको प्रसाद प्राप्त होगा।"
ऐसा ही हुआ । समस्त ब्राह्मणों को स्वयं रामराय जी प्रसाद परोसने लगे । सबको प्रसाद दिया, दक्षिणा दी, प्रणाम कर सम्मान किया । कहीं भी प्रसाद का अभाव नहीं हुआ । चारों और जय-जयकार होने लगी । उत्सव सम्पन्न हुआ ।

श्री राधामाधव की आज्ञा से श्री वृन्दावन प्रयाण :
श्री रामराय जी प्रतिदिन शयन से पूर्व श्री राधामाधव को प्रणाम करने उनके सम्मुख उपस्थित होते थे । एक दिन जब रात्रि में शयन से पूर्व श्री रामराय जी श्री राधामाधव को प्रणाम करने गए । श्री राधामाधव जी ने उन्हें आज्ञा की "रामराय जी, आप वृन्दावन चले जाइये । मैं स्वयं भी वृन्दावन आना चाहता हूँ, पहले आप जाइये, व्यवस्था कीजिये, तब मैं चंद्रगोपाल के संग वृन्दावन आ जाऊंगा ।"  ऐसा आदेश प्राप्त करते ही श्री रामराय जी रात्रि में श्री वृन्दावन के लिए चल पड़े । लाहौर से वृन्दावन बहुत दूर था । श्री रामराय जी बालक ही थे, किस दिशा में जा रहे थे उन्हें स्वयं ज्ञान नहीं था । प्रभु की ऐसी कृपा हुई की रात्रि में चले और सुबह होते ही हरिद्वार पहुँच गए । हरिद्वार का दर्शन करते ही श्री रामराय जी बहुत प्रसन्न हुए । गंगा जी को प्रणाम किया, पूजन किया एवं स्नान आचमन किया । इसके पश्चात् वे ब्रज धाम के लिए चल पड़े । चलते-चलते ब्रज की सीमा के निकट अलीगढ़ पहुँच गए । 
वहां श्री रामराय जी के नाना के परिचित ब्राह्मण रहते थे जिनका नाम प्रसादी था, और ये बड़े साधु-संत सेवी थे । श्री रामराय जी प्रसादी ब्राह्मण के घर ठहरे और वहीँ प्रसाद ग्रहण कर विश्राम किया । अगले दिन जब वे चलने लगे तब ब्राह्मण ने उनसे कहा कि "हे संत भगवान, आप दिखने में सिद्ध लगते हो, मैं बहुत गरीब हूँ, सामर्थ्य अनुसार मैं संतों की सेवा करता हूँ । आपसे प्रार्थना है की मेरी दरिद्रता दूर करें, जिससे मैं हरि, गुरु एवं वैष्णवों की सेवा करता रहूँ ।"
श्री रामराय जी को दया आ गयी । उन्होंने अपने ऊँगली से सोने की अंगूठी निकाल कर उस ब्राह्मण को दे दिया और कहा "तुम्हारी दरिद्रता आजसे दूर हो जाएगी, अब श्री राधामाधव एवं उनके भक्तों का भजन करो ।"
इसके बाद श्री रामराय जी ब्रज मंडल में प्रविष्ट हुए । ब्रज धाम में प्रवेश करते ही श्री रामराय जी की अद्भुत दशा हो गयी । ह्रदय में ब्रज-प्रेम का प्रकाश होने लगा । श्री रामराय जी मथुरा पहुंचे । वहां इन्होने ब्रजवासियों के लिए प्रसादी सेवा की । कुछ ही दिनों के पश्चात् समस्त ब्रजवासी श्री रामराय जी को 'प्रभु' कहने लग गए । तब से इनका नाम रामराय प्रभु हो गया । 
श्री रामराय जी सबसे वृन्दावन का मार्ग पूछते तो ब्रजवासीगण कहते की वृन्दावन तो सघन वन है, हिंसक पशुओं का वहां वास हैं, लुटेरे एवं डाकुओं का भी वहां वास है । इसलिए वहां जाने का नाम न लो । लेकिन श्री रामराय जी वृन्दावन जाना चाहते थे । जब रात्रि में सब विश्राम करने लगे तब बिना किसी को बताये श्री रामराय जी वृन्दावन के लिए चल पड़े एवं धीर-समीर यमुना किनारे पहुंचे । वहां श्री यमुना का दर्शन करने लगे । तब उन्होंने विकल होकर श्री वृन्दावन से अपने स्वरुप प्रकाश करने की प्रार्थना की । उनके प्रार्थना करते ही उन्हें श्री राधाकृष्ण एवं सखियों के दर्शन होने लगे, दिव्य यमुना कूल का दर्शन हुआ, अनेक रंगों के कमल खिले हैं, अनेक पुष्प लताएं सुशोभित हैं । दिव्य वृन्दावन एवं श्यामाश्याम का दर्शन कर श्री रामराय जे भाव-विभोर हो गए एवं अचेत हो भूमि पर गिर पड़े । तब उन्हें श्री राधामाधव की दिव्य वाणी सुनाई पड़ी "अभी तुम्हारा अखंड वृन्दावन-वास का समय नहीं आया है, तुम तीर्थाटन करो, तुम्हें गुरु की प्राप्ति होगी, अभी तुम्हें नाम-प्रचार करना है।"

श्री राधामाधव की आज्ञा से तीर्थाटन एवं श्री नित्यानंद प्रभु से भेंट :
प्रभु के आदेश को सुनते ही श्री रामराय जी तीर्थाटन के लिए चल पड़े एवं काशी पहुंचे । काशी में अनेक विद्वान् इनके तेज को देखकर इनसे प्रभावित हो शास्त्रार्थ करना चाहा । श्री रामराय जी ने समस्त विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित कर श्री कृष्ण भक्ति को वेद अनुसार स्थापित किया । समस्त विद्वान् बहुत प्रसन्न हुए एवं उन्हें रथ पर बैठकर उनकी शोभा यात्रा निकाली । जब वे गंगा किनारे पहुंचे तो श्री नित्यानंद प्रभु का दर्शन कर आकृष्ट हुए । रथ से उतरकर उन्होंने श्री नित्यानंद प्रभु को प्रणाम किया । श्री नित्यानंद प्रभु ने श्री रामराय जी को दीक्षा प्रदान की ।

काशी से नवद्वीप गमन एवं श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन :
काशी से श्री नित्यानंद प्रभु एवं श्री रामराय जी नवद्वीप के लिए चल पड़े । नवद्वीप में श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन प्राप्त हुआ । श्री रामराय जी को यह अनुभव हुआ की श्री चैतन्य महाप्रभु श्री राधा कृष्ण के मिलित स्वरुप हैं । श्री रामराय ने महाप्रभु को गीत गोविन्द के छटवें अध्याय का गान कर सुनाया । महाप्रभु बड़े प्रसन्न हुए और रामराय को ह्रदय से लगा लिया एवं आदेश किया "तुम अब वृंदावन चले जाओ ।" इस आदेश को पाकर श्री रामराय जी ने महाप्रभु को प्रणाम किया एवं ब्रज में आ गए । इसके पश्चात् श्री रामराय जी अखंड रूप से श्री वृन्दावन वास करने लगे ।

श्री राधामाधव जी का लाहौर से वृन्दावन आगमन :
लाहौर में श्री रामराय जी के माता-पिता का देहांत हो चूका था । श्री चंद्रगोपाल जी श्री राधामाधव की सेवा में थे । उन्हें रात्रि में स्वप्नादेश प्राप्त हुआ कि "श्री रामराय जी वृन्दावन में हैं, तुम भी ठाकुर जी के संग वृन्दावन चले जाओ ।" श्री चंद्रगोपाल जी स्वप्नादेश अनुसार ठाकुर श्री राधामाधव जी के संग वृन्दावन में श्री रामराय जी के पास आ गए । दोनों भ्राता ठाकुर जी की सेवा करने लगे । 

श्री रामराय जी का श्री वृन्दावन से प्रेम :

श्री रामराय जी कहते हैं कि श्री वृन्दावन श्री राधाकृष्ण की नित्य रास स्थली है, इसलिए मुझे प्रिय है । 
श्रीबृन्दावन प्यारौ प्यारी कौ तासौं मेरौ अविचल प्यार ।
निश दिन छिन छिन द्विगुन चतुर्गुन वढ़न चढ़न श्री वन उनिहार ॥ 
विविध वल्लरी विलसित कुसुमित कोटि कलप पल्लव रतनार । 
श्रीरामराय राधामाधव कौ होत निरन्तर रासविहार ॥ 
- श्री रामराय जी, आदिवाणी (81)

श्री रामराय जी कहते हैं हे मन, तू श्री वृन्दावन की रज में लोट । तेरे ह्रदय की विषय-वासना की ग्रंथि का मंथन हो जायेगा । 
रे मन श्री वन रजमें लोट ।
विषय कुपन्थ पन्थ के ग्रन्थन मन्थन कियौ वकोट ।
कितव न चितव हितव राधाधव जितव सु सब भव चोट ॥
मान प्रमान ज्ञान मर्जादा बढ़ैं गढ़ैं सग खोट ।
श्रीरामराय पुलिनावलि जैये बांधि धूरि की पोट ॥
- श्री रामराय जी, आदिवाणी (82)

श्री रामराय के अनुसार, वृंदावन के लिए एक प्रेम विकसित करना चाहिए जो श्री श्यामा श्याम की दिव्य सेवा प्रदान करता है। इसलिए कभी भी श्री वृंदावन धाम का त्याग एक क्षण के लिए भी नहीं करना चाहिए।
रे मन करि श्रीवन अनुराग ॥ [1]
चौरासी लखि सीढ़ी चढ़ि बढ़ि महल टहल हित आयौ लाग ।
पतन भये पुनि जतन न पैये जनम जनम भूले भ्रमराग ॥ [2]
मीतपाय श्रीराधामाधव रिपु दल दल क्यों जात अभाग ।
श्रीराम राय भगवानदास सुन श्रीवृन्दावन छिन्हु न त्याग ॥ [3]
- श्री रामराय, आदिवाणी (93)

श्री रामराय जी के रचित श्रृंगार-पदों की मधुरिमा की झलक:

श्री लालजी (श्री कृष्ण) ने श्री प्यारी जू का सुन्दर श्रृंगार किया है जिसका दर्शन कर सखियाँ मुस्कुरा रही हैं । श्री लालजी ने प्यारी के माथे पर मोर मुकुट, कानों में कुण्डल, भाल पर तिलक धारण कराया है एवं तन पर कस्तूरी का लेप लगाया है । कटी प्रदेश में पीताम्बर एवं गले में वनमाला धारण कराया है । लालजी ने प्यारी के चिबुक पर बिंदु लगाया है, नयन कमलों में काजल की रेख खींची है, मुख में ताम्बूल अर्पण किया है जिससे अधरों पर लालिमा छा गयी है । अंत में श्री लालजी ने प्यारी के हाथ में अपनी मुरली ही अर्पण कर दी जिसे देख कर श्री रामराय अपनी मति-गति भूल गए हैं । 
कियौ सिंगार लाल प्यारी कौ निरखि-निरखि सहचरि मुसक्यानी ॥
मोर मुकट माथे श्रुति कुण्डल भाल तिलक तन मृगमद सानी ।
पीताम्बर पटका कटि उपटत हार हिये बनमाल सुहानी ॥
चिबुक विन्दु सामल कज्जल चखि रस ताम्बूल लालिमा खानी ।
मुरली कर जु देत मोहन की रामराय मति गती भुलानी ॥
- श्री रामराय जी, आदिवाणी (17)

रचना :
श्री रामराय जी का हृदय  युगल उपासना को ही ग्रहण करता था । 
इनकी पहली रचना 'आदि वाणी' है जिसमें श्री राधा माधव की सेवा विषयक 101 सरस पदों का संकलन है । इसकी रचना 1513 में सावन मास में हुई थी । 
इनकी दूसरी रचना 'गीत गोविंद भाषा' है जो श्री जयदेव कृत संस्कृत के सुप्रसिद्ध गीत-काव्य 'गीत गोविंद' का ब्रजभाषा के पदों और छंदों में सरस अनुवाद है, जिसकी रचना 1565 में वैशाख मास में हुई थी । 
श्री रामराय जी ने ब्रह्म सूत्र पर ‘गौर विनोदिनी टिका’ की रचना भी की है । 

शिष्य :
श्री रामराय जी के अनेक शिष्य हुए जिनमें 12 शिष्य प्रधान थे । श्री भगवानदास, श्री गरीबदास, श्री विष्णुदास, श्री जुगलदास, श्री राधानाथ, श्री किशोरदास, श्री केशवदास, श्री मनोहरदास, श्री लाखादास, श्री मधुसूदनदास, श्री हरिदास एवं श्री तीर्थराम । 

लीला संवरण :
श्री रामराय जी 100 वर्ष की आयु तक जीवित रहे एवं 1583 में श्री वृन्दावन में ही धीर समीर यमुना पुलिन पर देह त्याग कर नित्य लीला में प्रविष्ट हुए ।