(दोहा)
पराभक्ति रति वर्द्धिनी, स्यामा सब सुख दैनि । रसिक मुकुटमनि राधिके, जय नव नीरज नैनि ॥
(स्तोत्र)
जयति जय राधा रसिक मनि मुकुट मनि हरनी त्रिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [1]
जयति गोरी नव किसोरी सकल सुख सीमा श्रिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [2]
जयति रति रस वर्द्धिनी अति अद्भुता सदया हिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [3]
जयति आनन्द कन्दिनी जगबन्दिनी वर वदनिये | पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [4]
जयति स्यामा अमित नामा वेद विधि निर्वाचिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [5]
जयति रास विलासिनी कल कला कोटि प्रकासिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [6]
जयति विविध बिहार कवनी रसिक रवनी सुभ धिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [7]
जयति चंचल चारु लोचनि दिवि दुकूला - भरनिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [8]
जयति प्रेमा प्रेम सीमा कोकिला कल बैनिये । पराभक्ति प्रदायिनि करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [9]
जयति कंचन दिव्य अंगी नवल नीरज नैनिये | पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [10]
जयति बल्लभ बल्लभा आनन्द कलभा तरुनिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [11]
जयति नागरि गुन उजागरि प्रान धन मन हरनिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [12]
जयति नौतम नित्य लीला नित्य धाम निवासिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [13]
जयति गुण माधुर्य भूपा सिद्धि रूपा शक्तिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [14]
जयति सुद्ध स्वभाव सीला स्यामला सुकुमारिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [15]
जयति जस जग प्रचुर परिकर श्रीहरिप्रिया जीवनि जिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [16]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (52)
संध्या आरती के पश्चात् प्रेम रूपा श्रीप्रियाजू से "पराभक्ति" प्राप्ति के लिए प्रार्थना कर रही हैं।
॥ दोहा ॥
सब सुखों को प्रदान करने वाली और "पराभक्ति" में रति को बढ़ाने वाली, नव-कमल-दल-नयनी, उन श्यामा श्रीराधारानी की जय हो जो रसिक-लाल की मुकुट-मणि अर्थात् शिरोभूषण-स्वरूपा हैं।
॥ स्तोत्र ॥
रसिक मुकट मणि लाल के भी मन को हरण करने वाली त्रिये, श्रीराधा रानी की जय हो । आप ही "पराभक्ति" प्रदान करने वाली हैं । हे करुणा की सागर प्रिये मुझ दीन पर कृपा करें । [1]
सब सुखों की सीमा स्वरूप लक्ष्मी नव किशोरी गौराँगीजी की जय हो । [2]
रति रस को बढ़ाने वाली अद्भुत प्रकार की दया हृदय में धारण करने वाली की जय हो । [3]
आनन्द की भी मूल स्वरूपा जग वन्दनीय लाल की भी वन्दनीय सुन्दर मुखार-विन्द वाली की जय हो । [4]
जिनके श्रीब्रह्माजी ने वेद में अनन्त नाम उच्चारण किये हैं ऐसी श्रीश्यामाजू की जय हो । [5]
करोड़ों मधुर मधुर कलाओं को प्रकाश करने वाली रास विलासिनी की जय हो अथवा रास विलास करने के लिए अपने एक स्वरूप से अपनी अंश कला रूपा जो करोड़ों गोपियों को प्रकाश करती हैं उनकी जय हो । [6]
विविध प्रकार के सुन्दर बिहारों द्वारा रसिक लाल अपने प्यारे को रमण कराने वाली शुभ बुद्धि वाली श्रीलड़ैतीजू की जय हो । [7]
अपने प्यारे को सुख प्रदान करने के लिए जिनके सुन्दर नेत्र कमल सदा चञ्चल रहते हैं ऐसी दिव्य वस्त्र आभूषण धारण करने वाली की जय हो । [8]
मूर्तिमान प्रेम स्वरूपा, प्रेम की अवधि रूपा तथा कोकिल सरीखा मधुर भाषण करने वाली की जय हो । [9]
स्वर्ण सदृश दिव्य मंगल विग्रह वाली डहडहे कमल सरीखे नेत्रों वाली की जय हो । [10]
अपने प्यारे लालजू की प्यारी, आनन्द की भी मधुर आभा अथवा आनन्द की कलाओं को प्रकाश करने वाली नित्य तरुण अर्थात् किशोर अवस्था वाली की जय हो । [11]
नागरिता अर्थात् सभ्यता के गुणों को प्रकाश करने वाली अपने प्राण धन स्वरूप लाजू के मन को हरण करने वाली की जय हो । [12]
नित्य नई-नई लीलाओं को विलसने वाली नित्य धाम श्रीवृन्दावन में निवास करने वाली की जय हो । [13]
सब माधुर्य गुणों की भूप स्वरूपा सब शक्तियों को सिद्धि प्रदान करने वाली की जय हो । [14]
शुद्ध शील स्वभाव वाली सुकुमारी श्यामलाजू की जय हो । [15]
जिनका यश जगत विख्यात है, जिनका अनन्त परिकर है और जो श्रीहरिप्रिया सखी के जीवन स्वरूपा हैं उनकी जय हो । आप ही "पराभक्ति" को प्रदान करने वाली हैं । हे करुणा की सागर स्वरूपा प्रिये ! मुझ दीन पर कृपा करें । [16]
पराभक्ति रति वर्द्धिनी, स्यामा सब सुख दैनि । रसिक मुकुटमनि राधिके, जय नव नीरज नैनि ॥
(स्तोत्र)
जयति जय राधा रसिक मनि मुकुट मनि हरनी त्रिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [1]
जयति गोरी नव किसोरी सकल सुख सीमा श्रिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [2]
जयति रति रस वर्द्धिनी अति अद्भुता सदया हिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [3]
जयति आनन्द कन्दिनी जगबन्दिनी वर वदनिये | पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [4]
जयति स्यामा अमित नामा वेद विधि निर्वाचिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [5]
जयति रास विलासिनी कल कला कोटि प्रकासिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [6]
जयति विविध बिहार कवनी रसिक रवनी सुभ धिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [7]
जयति चंचल चारु लोचनि दिवि दुकूला - भरनिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [8]
जयति प्रेमा प्रेम सीमा कोकिला कल बैनिये । पराभक्ति प्रदायिनि करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [9]
जयति कंचन दिव्य अंगी नवल नीरज नैनिये | पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [10]
जयति बल्लभ बल्लभा आनन्द कलभा तरुनिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [11]
जयति नागरि गुन उजागरि प्रान धन मन हरनिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [12]
जयति नौतम नित्य लीला नित्य धाम निवासिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [13]
जयति गुण माधुर्य भूपा सिद्धि रूपा शक्तिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [14]
जयति सुद्ध स्वभाव सीला स्यामला सुकुमारिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [15]
जयति जस जग प्रचुर परिकर श्रीहरिप्रिया जीवनि जिये । पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये ॥ [16]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (52)
संध्या आरती के पश्चात् प्रेम रूपा श्रीप्रियाजू से "पराभक्ति" प्राप्ति के लिए प्रार्थना कर रही हैं।
॥ दोहा ॥
सब सुखों को प्रदान करने वाली और "पराभक्ति" में रति को बढ़ाने वाली, नव-कमल-दल-नयनी, उन श्यामा श्रीराधारानी की जय हो जो रसिक-लाल की मुकुट-मणि अर्थात् शिरोभूषण-स्वरूपा हैं।
॥ स्तोत्र ॥
रसिक मुकट मणि लाल के भी मन को हरण करने वाली त्रिये, श्रीराधा रानी की जय हो । आप ही "पराभक्ति" प्रदान करने वाली हैं । हे करुणा की सागर प्रिये मुझ दीन पर कृपा करें । [1]
सब सुखों की सीमा स्वरूप लक्ष्मी नव किशोरी गौराँगीजी की जय हो । [2]
रति रस को बढ़ाने वाली अद्भुत प्रकार की दया हृदय में धारण करने वाली की जय हो । [3]
आनन्द की भी मूल स्वरूपा जग वन्दनीय लाल की भी वन्दनीय सुन्दर मुखार-विन्द वाली की जय हो । [4]
जिनके श्रीब्रह्माजी ने वेद में अनन्त नाम उच्चारण किये हैं ऐसी श्रीश्यामाजू की जय हो । [5]
करोड़ों मधुर मधुर कलाओं को प्रकाश करने वाली रास विलासिनी की जय हो अथवा रास विलास करने के लिए अपने एक स्वरूप से अपनी अंश कला रूपा जो करोड़ों गोपियों को प्रकाश करती हैं उनकी जय हो । [6]
विविध प्रकार के सुन्दर बिहारों द्वारा रसिक लाल अपने प्यारे को रमण कराने वाली शुभ बुद्धि वाली श्रीलड़ैतीजू की जय हो । [7]
अपने प्यारे को सुख प्रदान करने के लिए जिनके सुन्दर नेत्र कमल सदा चञ्चल रहते हैं ऐसी दिव्य वस्त्र आभूषण धारण करने वाली की जय हो । [8]
मूर्तिमान प्रेम स्वरूपा, प्रेम की अवधि रूपा तथा कोकिल सरीखा मधुर भाषण करने वाली की जय हो । [9]
स्वर्ण सदृश दिव्य मंगल विग्रह वाली डहडहे कमल सरीखे नेत्रों वाली की जय हो । [10]
अपने प्यारे लालजू की प्यारी, आनन्द की भी मधुर आभा अथवा आनन्द की कलाओं को प्रकाश करने वाली नित्य तरुण अर्थात् किशोर अवस्था वाली की जय हो । [11]
नागरिता अर्थात् सभ्यता के गुणों को प्रकाश करने वाली अपने प्राण धन स्वरूप लाजू के मन को हरण करने वाली की जय हो । [12]
नित्य नई-नई लीलाओं को विलसने वाली नित्य धाम श्रीवृन्दावन में निवास करने वाली की जय हो । [13]
सब माधुर्य गुणों की भूप स्वरूपा सब शक्तियों को सिद्धि प्रदान करने वाली की जय हो । [14]
शुद्ध शील स्वभाव वाली सुकुमारी श्यामलाजू की जय हो । [15]
जिनका यश जगत विख्यात है, जिनका अनन्त परिकर है और जो श्रीहरिप्रिया सखी के जीवन स्वरूपा हैं उनकी जय हो । आप ही "पराभक्ति" को प्रदान करने वाली हैं । हे करुणा की सागर स्वरूपा प्रिये ! मुझ दीन पर कृपा करें । [16]

