राधा बिन जानौं हौं जो पै और काहू कों,
तौ पै मन लाखि लाखि लाखि कुलगारि है।
- श्री वंशी अली जी, हृदय सर्वस्व (47)
यदि श्री राधा के अतिरिक्त मेरे हृदय का सम्बंध किसी भी और से हो तो मेरे साथ मेरे कुल को लाखों लाखों धिक्कार है ।
तौ पै मन लाखि लाखि लाखि कुलगारि है।
- श्री वंशी अली जी, हृदय सर्वस्व (47)
यदि श्री राधा के अतिरिक्त मेरे हृदय का सम्बंध किसी भी और से हो तो मेरे साथ मेरे कुल को लाखों लाखों धिक्कार है ।

