(राग कल्याण)
लाल की रूप माधुरी नैननि निरखि नेकु सखी ।
मनसिज मन हरन - हास, साँवरौ सुकुमार रासि,
नखसिख अङ्ग - अंगनि उमँगि सौभग सींव नखी ॥ [1]
रँगमगी सिर सुरँग पाग लटकि रही वाम भाग,
चंपकली कुटिल अलक बीच - बिच रखी ।
आयत दृग अरुण लोल कुंडल मंडित कपोल,
अधर दसन दीपति की छवि क्यौं हूँ न जात लखी ॥ [2]
अभयद भुज दंड मूल पीन अंस सानुकूल,
कनक निकष लसि दुकूल दामिनी धरखी ।
उर पर मंदार हार मुक्ता लर वर सुढार,
मत्त दुरद गति तियनि की देह दसा करखी ॥ [3]
मुकुलित वय नव किसोर, वचन रचन चित के चोर,
मधु रितु पिक साव नूत मंजरी चखी ॥ [4]
(जैश्री) नटवत 'हरिवंश' गान, रागिनी कल्यान तान,
सप्त स्वरन कल, इते पर मुरलिका बरखी ॥ [5]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (22)
हे सखी, तू अपने नेत्रों से लाल की रूप माधुरी को तनिक देख तो सही । सुकुमारता की राशि श्रीश्यामसुन्दर की मुसकान कामदेव के मन को हरण करने वाली है । उनके नख से शिखा पर्यन्त विभिन्न अंग इतने अधिक सुन्दर हैं मानो उन्होंने उमँगकर सुन्दरता की सीमा का उल्लंघन कर दिया है । [1]
उनके सिर पर सुन्दर लाल पाग बँधी है जो बाँई ओर ( श्रीराधा की ओर) झुकी हुई है और उनकी घुँघराली अलकों के बीच-बीच में चम्पा की कली शोभायमान हैं । उनके बड़े-बड़े नेत्र अरुण और चंचल हैं, उनके कपोल कुंडल से मंडित हैं और उनके अधर एवं दशनों की कांति छटा पर किसी प्रकार भी नेत्र जम नहीं पाते । [2]
उनकी भुजायें अभय प्रदान करने वाली हैं और वैसे ही पुष्ट कंधे हैं । उनके श्याम शरीर पर पीताम्बर इस प्रकार सुशोभित है जैसे कसौटी पर स्वर्ण रेखा खिंच रही हो और उसको (पीताम्बर को ) देखकर दामिनी दब गई है । [3]
उनके वक्षस्थल पर मंदार (स्वर्गीय पुष्प) का हार सुशोभित है और उसके साथ सुडौल मोतियों की माला धारण हो रही है । उनकी मत्त गजराज जैसी चाल देखकर स्त्रियों ने देह दशा विसार दी है । [4]
उनकी खिली हुई नवकिशोर अवस्था है, उनकी वाणी चित्त को चुराने वाली है (जिसको सुनकर ऐसा मालुम होता है) मानो वसन्त ऋतु में आम की मंजरी को चाखकर कोयल का बच्चा बोल रहा हो । [5]
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि सुन्दर सप्त स्वरों का आश्रय लेकर वे तानें लेते हुए भाव प्रदर्शन पूर्वक कल्याण रागिनी का गान कर रहे हैं । इतना सब कुछ करते हुए वे वंशी के द्वारा (अमृतमय) स्वरों की वर्षा भी कर रहे हैं । [6]
लाल की रूप माधुरी नैननि निरखि नेकु सखी ।
मनसिज मन हरन - हास, साँवरौ सुकुमार रासि,
नखसिख अङ्ग - अंगनि उमँगि सौभग सींव नखी ॥ [1]
रँगमगी सिर सुरँग पाग लटकि रही वाम भाग,
चंपकली कुटिल अलक बीच - बिच रखी ।
आयत दृग अरुण लोल कुंडल मंडित कपोल,
अधर दसन दीपति की छवि क्यौं हूँ न जात लखी ॥ [2]
अभयद भुज दंड मूल पीन अंस सानुकूल,
कनक निकष लसि दुकूल दामिनी धरखी ।
उर पर मंदार हार मुक्ता लर वर सुढार,
मत्त दुरद गति तियनि की देह दसा करखी ॥ [3]
मुकुलित वय नव किसोर, वचन रचन चित के चोर,
मधु रितु पिक साव नूत मंजरी चखी ॥ [4]
(जैश्री) नटवत 'हरिवंश' गान, रागिनी कल्यान तान,
सप्त स्वरन कल, इते पर मुरलिका बरखी ॥ [5]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (22)
हे सखी, तू अपने नेत्रों से लाल की रूप माधुरी को तनिक देख तो सही । सुकुमारता की राशि श्रीश्यामसुन्दर की मुसकान कामदेव के मन को हरण करने वाली है । उनके नख से शिखा पर्यन्त विभिन्न अंग इतने अधिक सुन्दर हैं मानो उन्होंने उमँगकर सुन्दरता की सीमा का उल्लंघन कर दिया है । [1]
उनके सिर पर सुन्दर लाल पाग बँधी है जो बाँई ओर ( श्रीराधा की ओर) झुकी हुई है और उनकी घुँघराली अलकों के बीच-बीच में चम्पा की कली शोभायमान हैं । उनके बड़े-बड़े नेत्र अरुण और चंचल हैं, उनके कपोल कुंडल से मंडित हैं और उनके अधर एवं दशनों की कांति छटा पर किसी प्रकार भी नेत्र जम नहीं पाते । [2]
उनकी भुजायें अभय प्रदान करने वाली हैं और वैसे ही पुष्ट कंधे हैं । उनके श्याम शरीर पर पीताम्बर इस प्रकार सुशोभित है जैसे कसौटी पर स्वर्ण रेखा खिंच रही हो और उसको (पीताम्बर को ) देखकर दामिनी दब गई है । [3]
उनके वक्षस्थल पर मंदार (स्वर्गीय पुष्प) का हार सुशोभित है और उसके साथ सुडौल मोतियों की माला धारण हो रही है । उनकी मत्त गजराज जैसी चाल देखकर स्त्रियों ने देह दशा विसार दी है । [4]
उनकी खिली हुई नवकिशोर अवस्था है, उनकी वाणी चित्त को चुराने वाली है (जिसको सुनकर ऐसा मालुम होता है) मानो वसन्त ऋतु में आम की मंजरी को चाखकर कोयल का बच्चा बोल रहा हो । [5]
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि सुन्दर सप्त स्वरों का आश्रय लेकर वे तानें लेते हुए भाव प्रदर्शन पूर्वक कल्याण रागिनी का गान कर रहे हैं । इतना सब कुछ करते हुए वे वंशी के द्वारा (अमृतमय) स्वरों की वर्षा भी कर रहे हैं । [6]

