सर्वोपरि है मधुर रस, जुगल-किसोर विलास ।
ललितादिक सेवतिं तिनहिं, मिटत न कबहुँ हुलास ॥
- श्री ध्रुवदास, भजनाष्टक (3)
श्री जुगल-किशोर (श्री राधा-कृष्ण) का वृंदावनीय रस विलास और उनका मधुर रस ही समस्त रसों में सर्वोपरि है जिसका ललिता आदि सखियाँ निरंतर हर्षोल्लास युक्त सेवन करती हैं ।
ललितादिक सेवतिं तिनहिं, मिटत न कबहुँ हुलास ॥
- श्री ध्रुवदास, भजनाष्टक (3)
श्री जुगल-किशोर (श्री राधा-कृष्ण) का वृंदावनीय रस विलास और उनका मधुर रस ही समस्त रसों में सर्वोपरि है जिसका ललिता आदि सखियाँ निरंतर हर्षोल्लास युक्त सेवन करती हैं ।

