कोऊ जोग जज्ञ तप संजम क्रिया को करैं - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त एवं सवैया (11)

कोऊ जोग जज्ञ तप संजम क्रिया को करैं - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त एवं सवैया (11)

कोऊ जोग जज्ञ तप संजम क्रिया को करैं,
मौनि व्रतु धरैं प्रानायाम सांस कै। [1]
कोऊ पै पान कै पुराननि को गान करै,
कोऊ जोति अगनि ह्वै देवनि की आस कै॥ [2]
कोऊ लीला रास सुविलासनि के चारि भरे,
लेत हैं महाप्रसाद भरि-भरि तास कै। [3]
वृंदावन -पन निजु धनु सदा स्यामा-स्याम,
माधुरी निकुंज केलि स्वामी हरिदास कै॥ [4]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त एवं सवैया (11) 

कोई योग करता है, कोई यज्ञ। कोई तप करता है, तो कोई संयमपूर्वक क्रियाएँ करता है। कोई मौन व्रत धारण करता है, तो कोई स्वास पर केंद्रित प्राणायाम का अभ्यास करता है। [1]

कोई पुराणों का पठन और गान करता है, तो कोई परम ज्योति में लीन होकर ब्रह्म को प्राप्त करने का प्रयास करता है। [2]

कोई श्री श्यामाश्याम के रास विलास रस के चिंतन में डूबा रहता है और उस लीला दर्शन के महाप्रसाद को भर-भरकर ग्रहण करता है। [3]

श्री रूप सखी जी कहती हैं कि अनन्य नृपति, रसिकशेखर श्री स्वामी हरिदास का प्रण यही है कि वे श्री वृन्दावन में नित्य वास करें, जहाँ उनके प्राण-धन श्री श्यामाश्याम निकुंज में अखंड रूप से मधुरतम केलि-लीला में निमग्न रहते हैं। [4]