जो कछु लिख्यौ ललाट में, दुख सुख देही संग - श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (18)

जो कछु लिख्यौ ललाट में, दुख सुख देही संग - श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (18)

जो कछु लिख्यौ ललाट में, दुख सुख देही संग ।
भुगतैगौ जहँ जाइगौ, यह सिद्धांत अभंग ।। [1]
यह सिद्धांत अभंग, तजत क्यों धीरज प्रानी ।
वृन्दावन परिहरे, प्रिया प्रीतम रजधानी ।। [2]
भगवत नित्यबिहार, स्याम स्यामाँ को गैलछु ।
भूख प्यास सहि रहे, आनि बीते सिर जो कछु ।। [3]

- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (18)

भाग्य में जो कुछ दुःख सुख लिखा है वह इस शरीर के साथ जुड़ा है। तुम जहाँ कहीं भी जाओगे, वहीं वह भोगना पड़ेगा । यह सिद्धांत अटल है। [1]

इसलिए हे प्राणी, तुम धीरज क्यों खो रहे हो और क्यों प्रिया प्रियतम की राजधानी इस वृन्दावन का परित्याग कर रहे हो ? [2] 

भगवतरसिकजी कहते हैं कि भूख प्यास या जो कुछ आपदा विपदा तुम्हारे ऊपर आ पड़े, उस सबको सहकर तुम निरंतर यहीं रहो और प्रिया प्रियतम के नित्यबिहार को देखो और गाओ । [3]