अब तौ क्या इस छबि पर वारौं - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (459)

अब तौ क्या इस छबि पर वारौं - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (459)

अब तौ क्या इस छबि पर वारौं,
यही सोच उर आवै है। [1]
पल-पल रोम-रोम पर तन मन,
कोटिनु तुच्छ दिखावै है॥ [2]
कोटि विश्व इक रोम निछावर,
तउ संतोष न आवै है। [3]
करना दूर बनैं न मनोरथ,
'भोरी' मन पछतावै है॥ [4]

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (459)

श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि मैं हमेशा यही सोचती रहती हूँ कि प्रेम की अद्वय युगल मूर्त्ति श्रीहित लाड़िली-लाल के अद्भुत सौन्दर्य सम्पन्न रूप की अनुपम शोभा पर क्या न्यौछावर किया जाय। [1]

क्योंकि उनके रोम-रोम पर प्रतिक्षण अपने कोटि-कोटि तन-मन को न्यौछावर करना तो अत्यन्त तुच्छ प्रतीत होता है ? [2]

यदि उनके एक रोम पर करोड़ों विश्व की सुन्दरता को भी न्यौछावर कर दिया जाय, तो भी हृदय को सन्तुष्टि नहीं मिल पाती है। [3]

ऐसा करना तो बहुत दूर की बात है, मन में ऐसा करने का विचार भी उत्पन्न नहीं होता है, इसलिये मन को अत्यन्त पछतावे का अनुभव हो रहा है। [4]