(राग सारंग)
पाछैं बैठे मोहन मृगनैंनींकी बैंनी गुहत,
सोभा न कही परै देखत नैंन सिरात। [1]
नखछबि रवि जानि पानि-कमल फूले,
निकसि चली अलि सैंनी अधरात॥ [2]
मानौं वारिज विधुसौं रिपु मति तजि,
सदल सुधा पीवत न अघात। [3]
श्याम-भुजंगिनिके डर डोरी बांधत,
व्यासकी स्वामिनीकौ सुंदर अकुलात॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (44)
श्री कृष्ण श्री राधा के पीछे बैठकर उनकी वेणी गूँथ रहे हैं, इस छवि की शोभा कहते नहीं बनती, जिसे देख मेरी ऑंखें शीतल हो रही हैं। [1]
श्री राधा की नख-ज्योति के प्रकाश को सूर्य जानकर जल में कमल खिल गए हैं एवं भृंग अकुलाकर एक दूसरे को संकेत करते हुए अर्ध रात्रि को निकल आये हैं। [2]
ऐसा प्रतीत होता है मानो कमल चन्द्रमा से शत्रुता का त्याग करके उसके संग श्री श्यामाश्याम की रूप-माधुरी रस का पान कर अघा नहीं रहा है। [3]
श्री राधा की वेणी भुजंग नाग के समान है, जिसे देखकर श्री कृष्ण भयभीत होकर वेणी में डोरी बांधते हैं । श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि श्री श्याम सुंदर उनकी स्वामिनी श्री राधा के सुंदर मुख कमल के दर्शन को अकुला रहे हैं। [4]
पाछैं बैठे मोहन मृगनैंनींकी बैंनी गुहत,
सोभा न कही परै देखत नैंन सिरात। [1]
नखछबि रवि जानि पानि-कमल फूले,
निकसि चली अलि सैंनी अधरात॥ [2]
मानौं वारिज विधुसौं रिपु मति तजि,
सदल सुधा पीवत न अघात। [3]
श्याम-भुजंगिनिके डर डोरी बांधत,
व्यासकी स्वामिनीकौ सुंदर अकुलात॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (44)
श्री कृष्ण श्री राधा के पीछे बैठकर उनकी वेणी गूँथ रहे हैं, इस छवि की शोभा कहते नहीं बनती, जिसे देख मेरी ऑंखें शीतल हो रही हैं। [1]
श्री राधा की नख-ज्योति के प्रकाश को सूर्य जानकर जल में कमल खिल गए हैं एवं भृंग अकुलाकर एक दूसरे को संकेत करते हुए अर्ध रात्रि को निकल आये हैं। [2]
ऐसा प्रतीत होता है मानो कमल चन्द्रमा से शत्रुता का त्याग करके उसके संग श्री श्यामाश्याम की रूप-माधुरी रस का पान कर अघा नहीं रहा है। [3]
श्री राधा की वेणी भुजंग नाग के समान है, जिसे देखकर श्री कृष्ण भयभीत होकर वेणी में डोरी बांधते हैं । श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि श्री श्याम सुंदर उनकी स्वामिनी श्री राधा के सुंदर मुख कमल के दर्शन को अकुला रहे हैं। [4]

