(राग विलावल)
जाकौं वेद रटत ब्रह्मा रटत, शम्भु रटत शेष रटत।
जाकौं वेद रटत ब्रह्मा रटत, शम्भु रटत शेष रटत।
नारद शुक व्यास रटत, पावत नहीं पार री॥ [1]
ध्रुवजन प्रह्लाद रटत, कुंति के कुँवर रटत।
द्रुपद सुता रटत नाथ, अनाथन प्रतिपाल री॥ [2]
गणिका गज गीध रटत, गौतम की नारि रटत।
राजन की रमणी रटत, सुतन दै दै प्यार री॥ [3]
नन्ददास श्रीगोपाल, गिरिवरधर रूप जाल।
जसोदा कौ कुँवर लाल, राधा उरहार री॥ [4]
- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, पदावली (1)
जिसके नाम को वेद रटते हैं, ब्रह्मा रटते हैं, भगवान शिव रटते हैं, शेष रटते हैं, नारद, शुकदेव एवं वेद व्यास जी रटते हैं लेकिन पार नहीं पाते। [1]
जिसके नाम को भक्त ध्रुव एवं प्रह्लाद रटते हैं, कुंतीनंदन अर्जुन रटते हैं, द्रौपदी रटती है, वे अनाथों के प्रतिपालक हैं। [2]
जिसके नाम को गणिका, गीधराज जटायु एवं गजेंद्र रटते हैं, गौतम पत्नी अहिल्या रटती है, महारानियाँ रटती हैं एवं अपने पुत्रों को प्यार देती हैं। [3]
श्री नंददास जी कहते हैं कि वही गिरिधर श्री गोपाल हैं जिनके रूप-जाल में सब अटके हैं, वे यशोदा के नंद लाल श्री राधा के ह्रदय का हार बने हुए हैं। [4]

