ऐसी जिय होत जो जिय सौं जिय मिलै - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (35)

ऐसी जिय होत जो जिय सौं जिय मिलै - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (35)

(राग केदारौ)
ऐसी जिय होत जो जिय सौं जिय मिलै
तन सौं तन समाइ लैहुँ तौ देखौं कहा हो प्यारी । [1]
तोही सौं हिलगि आँखैं आँखिन सौं मिली रहैं
जीवत कौ यहै लहा हो प्यारी ॥ [2]
मौकों इतौ साज कहाँ री हौं अति दीन तुव बस
भुव छेप जाइ न सहा हो प्यारी । [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्याम कहत राखि लै री
बाहु बल हौं बपुरा काम दहा हो प्यारी ॥ [4]

- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (35)

श्री श्यामसुंदर प्यारी श्री राधा से कहते हैं - हे प्यारी जू, मेरी ऐसी इच्छा हो रही है कि हृदय से हृदय मिल जाये, तन में तन समा जाय, परन्तु हे प्यारी,  फिर मैं आपके दर्शन कहाँ कर पाउँगा ? [1]

आपसे लगी हुई मेरी आंखें आपकी आँखों से मिली रहें, जीवित रहने के लिए यही पर्याप्त है । [2]

हे प्यारी ! मेरा इतनी सामर्थ्य कहाँ है, मै अति दीन आपके वश (शरण) में हूँ । आपकी उठी हुई भृकुटि मुझसे सही नहीं जाती । [3]

श्री स्वामी हरिदास जी के स्वामी श्री श्यामसुन्दर श्री श्यामा जू से कहते हैं कि हे प्यारी जू, मुझे अपने भुज-पाश में ले लीजिये, मैं बेचारा कामाग्नि से जल रहा हूँ । [4]