सुखद वृंदावन सुखद यमुना तट - श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (74)

सुखद वृंदावन सुखद यमुना तट - श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (74)

(राग मलार)
सुखद वृंदावन सुखद यमुना तट
सुखद कुंज भवन रच्यौ है हिंडोरौ ।
सुखद कलपतरु सुखद फलफूल
सुखद वहति सीतल पवन झकौरौ ॥ [1]
सुखद रंगीले संग सुखद रंगीली राधा
सुखद करत केलि रतिपति जोरौ ।
सुखद सखी झुलावैं, सुखद गीत गावैं
सुखद गरजि बरषत थोरौ थोरौ ॥ [2]
सुखद हरित भूमि सुखद बूंदनि रंग
सुखद कोकिला कल मोर चकोरौ ।
सुखद बजावै वेनु सुजस सुनि
सुखद गदाधर चित्त कौ चोरौ ॥ [3]

- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (74)

श्री वृन्दावन सुखमय है, श्री यमुना तट सुखमय है एवं वहाँ के कुञ्ज भवन सुखमय है जहाँ हिंडोरा की रचना हुई है ।
लता-पता सुखमय है, फल-फूल सुखमय है, बहती हुई शीतल पवन के झकोरे सुखमय है । [1]

रंगीले श्री कृष्ण सुखद हैं, रंगीली श्री राधा सुखद हैं, एवं दोनों की केलि लीला सुखद है ।
श्री श्यामाश्याम को सखी झूला रही है जो सुखमय है, कुछ अन्य सखियाँ मधुर गीत गा रही हैं जो सुखद है, मेघ गरज-गरज के थोड़ी-थोड़ी वर्षा कर रहे है, जो सुखमय है । [2]

श्री वृन्दावन की भूमि हरी-भरी है जो सुखमय है, उनपर वर्षा की बूंदे सुखमय है एवं कोकिला, कलहंस, मोर, चकोर की मधुर ध्वनि सुखमय है ।
श्री गदाधर भट्ट जी कहते हैं कि श्री कृष्ण सुखमय वेणु बजा रहे हैं जो मेरे चित्त को सुखपूर्वक चुरा रही है । [3]