प्रेम अनुराग सों चित्त उन्मत्त हवै
फिरों वन सघन रस रंग भीनौं। [1]
करत उच्चार सुकुवारि कहाँ लाड़िली
स्वास गम्भीर दृग नीर कोनौं॥ [2]
कभूँ ठहराऊँ, उकलाऊँ, गिरि जाऊं धर
कुँवरि जब आइ चित्त चाई दीनौं। [3]
मधुर मधु चाव सौं बाहु 'अलबेली' गह
नैंन पद सौं पौंछि भर अंक लीनौं॥ [4]
- श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (86)
प्रेम अनुराग से उन्मत्त चित्त होकर, मैं वृंदावन के ही सघन कुंजों में श्री राधिका के रस रँग में भींज कर घूमता रहूँ। [1]
केवल श्री राधा नाम का उच्चारण करता हुआ, केवल लाड़िली जी [श्री राधा] की बाट जोहता हुआ, केवल आखों से आँसु बहाता रहूँ। [2]
कभी ठहर जाऊँ, उकलाऊँ, कभी भाव विभोर होकर गिर जाऊँ, तब कुंवरी जी [श्री राधा] आकर मुझे दर्शन दें। [3]
श्री अलबेली अलि जी कहते हैं कि तब श्री लाड़िली [श्री राधा] मधुर चाव से मेरे आँसुओं को पोंछकर अंक में भर लें (हृदय से लगा लें)। [4]
फिरों वन सघन रस रंग भीनौं। [1]
करत उच्चार सुकुवारि कहाँ लाड़िली
स्वास गम्भीर दृग नीर कोनौं॥ [2]
कभूँ ठहराऊँ, उकलाऊँ, गिरि जाऊं धर
कुँवरि जब आइ चित्त चाई दीनौं। [3]
मधुर मधु चाव सौं बाहु 'अलबेली' गह
नैंन पद सौं पौंछि भर अंक लीनौं॥ [4]
- श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (86)
प्रेम अनुराग से उन्मत्त चित्त होकर, मैं वृंदावन के ही सघन कुंजों में श्री राधिका के रस रँग में भींज कर घूमता रहूँ। [1]
केवल श्री राधा नाम का उच्चारण करता हुआ, केवल लाड़िली जी [श्री राधा] की बाट जोहता हुआ, केवल आखों से आँसु बहाता रहूँ। [2]
कभी ठहर जाऊँ, उकलाऊँ, कभी भाव विभोर होकर गिर जाऊँ, तब कुंवरी जी [श्री राधा] आकर मुझे दर्शन दें। [3]
श्री अलबेली अलि जी कहते हैं कि तब श्री लाड़िली [श्री राधा] मधुर चाव से मेरे आँसुओं को पोंछकर अंक में भर लें (हृदय से लगा लें)। [4]

