तत्स्पर्शपुष्पगंधादि नानासौरभसंभवः तत्प्रिया प्रकृतिस्त्वाद्या राधिका कृष्णवल्लभा ।।
तत्कलाकोटिकोट्यंशा दुर्गाद्यास्त्रिगुणात्मिकाः तस्या अंघ्रिरजः स्पर्शात्कोटिविष्णुः प्रजायते ।।
- पद्मपुराण, खण्डः 5 (पातालखण्डः), अध्याय 69, छंद (117-118)
श्री कृष्णवल्लभा श्रीराधिका ही आद्याप्रकृति हैं। उन राधिका के कोटि-कोटि कलांश से ही त्रिगुणमयी दुर्गा आदि देवियों का प्रादुर्भाव होता है। उन राधिका के पद-रज स्पर्श से करोड़ों विष्णुओं का (व्यापक-पालक-शक्तियों का) उदय हुआ करता है।
तत्कलाकोटिकोट्यंशा दुर्गाद्यास्त्रिगुणात्मिकाः तस्या अंघ्रिरजः स्पर्शात्कोटिविष्णुः प्रजायते ।।
- पद्मपुराण, खण्डः 5 (पातालखण्डः), अध्याय 69, छंद (117-118)
श्री कृष्णवल्लभा श्रीराधिका ही आद्याप्रकृति हैं। उन राधिका के कोटि-कोटि कलांश से ही त्रिगुणमयी दुर्गा आदि देवियों का प्रादुर्भाव होता है। उन राधिका के पद-रज स्पर्श से करोड़ों विष्णुओं का (व्यापक-पालक-शक्तियों का) उदय हुआ करता है।

