(राग सारंग)
वृंदावन सघन कुंज, माधुरी द्रुम भँवर गुंज,
नित बिहार प्रिया प्रीतम, देखिवौई कीजै। [1]
गौर स्याम नंद किसोर, सुंदर अति चित्त चोर,
निरखि-नरखि रूप सुधा, नैनन भरि पीजै॥ [2]
सखियन संग करत गान, सारंग सुर लेत मान,
मंद-मंद मधुर-मधुर, सुनिसुनि सुख लीजै। [3]
बाढ़यौ अति हिय हुलास, प्रफुलित सब सुखद हास,
तन मन धन 'रसिक' ऊपर, बारन कर दीजै॥ [4]
- गोस्वामी श्री हरिराय जी
श्री वृंदावन धाम की सघन निकुंजों में जहां भँवर गुंजार करते हैं वहाँ श्री प्रिया प्रियतम नित्य विहार करते है, जिनकी अनुपम रूप माधुरी को इन नेत्रों से निहारना चाहिए। [1]
श्री राधा कृष्ण गौर एवं श्याम वर्ण के नित्य किशोर अवस्था में रहने वाले हैं जो अत्यंत ही सुंदर हैं, एवं चित्त को चुरा लेने वाले हैं जिनकी रूप सुधा का पान नैनों को भर भर कर पीना चाहिए। [2]
सखियों के संग जो (श्री राधा कृष्ण) सारंग राग में मधुर मधुर गान कर रहे हैं, उसको सुन सुन कर सुख का अनुभव करिए। [3]
जिनका माधुर्य निहार हृदय अति उल्लसित हो जाता है, जो सुखद हास परिहास पारायण हैं, ऐसे दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण पर अपना तन, मन, एवं धन नयौछावर कर देना चाहिए। [4]
वृंदावन सघन कुंज, माधुरी द्रुम भँवर गुंज,
नित बिहार प्रिया प्रीतम, देखिवौई कीजै। [1]
गौर स्याम नंद किसोर, सुंदर अति चित्त चोर,
निरखि-नरखि रूप सुधा, नैनन भरि पीजै॥ [2]
सखियन संग करत गान, सारंग सुर लेत मान,
मंद-मंद मधुर-मधुर, सुनिसुनि सुख लीजै। [3]
बाढ़यौ अति हिय हुलास, प्रफुलित सब सुखद हास,
तन मन धन 'रसिक' ऊपर, बारन कर दीजै॥ [4]
- गोस्वामी श्री हरिराय जी
श्री वृंदावन धाम की सघन निकुंजों में जहां भँवर गुंजार करते हैं वहाँ श्री प्रिया प्रियतम नित्य विहार करते है, जिनकी अनुपम रूप माधुरी को इन नेत्रों से निहारना चाहिए। [1]
श्री राधा कृष्ण गौर एवं श्याम वर्ण के नित्य किशोर अवस्था में रहने वाले हैं जो अत्यंत ही सुंदर हैं, एवं चित्त को चुरा लेने वाले हैं जिनकी रूप सुधा का पान नैनों को भर भर कर पीना चाहिए। [2]
सखियों के संग जो (श्री राधा कृष्ण) सारंग राग में मधुर मधुर गान कर रहे हैं, उसको सुन सुन कर सुख का अनुभव करिए। [3]
जिनका माधुर्य निहार हृदय अति उल्लसित हो जाता है, जो सुखद हास परिहास पारायण हैं, ऐसे दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण पर अपना तन, मन, एवं धन नयौछावर कर देना चाहिए। [4]

