जय जय निज आनंद लड़ावनि लाड़ली - श्री वंशी अलि, श्री ललिता मंगल (1)

जय जय निज आनंद लड़ावनि लाड़ली - श्री वंशी अलि, श्री ललिता मंगल (1)

जय जय निज आनंद लड़ावनि लाड़ली।
छिन छिन मुष अवलोक मत्त अति चाड़िली॥ [1]
मृदु मुसिकान बिकान भुलावति मोहिनी।
हंसी हेरनि लड़िकाय चपल दृग जोहिनी॥ [2]
दृग सोहनी बस मोहनी कटि कुँवरि छवि नित झेलहीं।
पीवत पिवावत राधिका रस नेह ग्रंथनि मेलिहीं॥ [3]

- श्री वंशी अलि, श्री ललिता मंगल (1)

श्री ललिता जी की जय हो जिनका निज आनंद कोई और नहीं स्वयं श्री राधा हैं जिन्हें वे बड़े ही प्रेम से लाड़ लड़ाती हैं। वे हर क्षण प्रेम में अति उन्मत्त होकर श्री राधा का ही मुख अवलोकन करती हैं। [1]

श्री ललिता जी श्री राधा की मृदु मुस्कान में बिकी हुई सी स्वत्व को भूलकर मोहित हो जाती हैं। वे श्री राधा के हंसकर देखने वाले बड़े गरबीले चपल दृगों को जोहती रहती हैं। [2]

वे श्री राधा की सुंदर लगने वाली दृष्टि और कटि की छवि को नित्य झेलती हैं। श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि श्री ललिता जी स्वयं भी राधिका रस पीती हैं एवं दूसरों को भी नेह की ग्रंथियों में राधिका रस को मिलाकर पान कराती हैं। [3]