जब तैं विलोक्यौ तोहि सुन्दर कुँवर कान्ह,
तब ही तें बाको चित्त चंग सो चढ़त हैं। [1]
डोलत फिरत नहीं खोलत हिये की पीर,
मेरी कर तेरी सौंह तो जस पढ़त हैं॥ [2]
तुम तो सुघर स्यानी कहिये सबैई बात,
चलिये जरूर बैठें कहो का कढ़त हैं। [3]
मेटो मन बाधा हठी पूजै मन साधा वे तौ,
रातौ दिन राधा राधा राधा ही रटत हैं॥ [4]
- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (54)
हे राधिका! जब से श्री श्यामसुंदर ने तुम्हें निहारा है, तब से उनका चित्त पतंग के समान आसमान में उड़ रहा है। [1]
श्यामसुंदर मानो डोलते हुए फिरते हैं और अपनी हृदय की पीर किसी से कह भी नहीं पा रहे। मैं अपने हाथों से तुम्हारी शपथ खाकर कहता हूँ कि वे दिन-रात केवल तुम्हारा ही यशोगान करते रहते हैं। [2]
हे प्यारी जू, आप तो सुंदर और स्यानी हो। आप ही बताओ, आपका क्या बिगड़ेगा यदि आप श्यामसुंदर से मिलेंगी और उनके संग आसन पर विराजमान होंगी? [3]
श्री हठी जी कहते हैं कि श्री श्यामसुंदर के हृदय की समस्त बाधाओं को मिटाकर उनकी समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण कीजिए, क्योंकि वे अनन्य भाव से दिन-रात “राधा राधा राधा” ही रटते हैं। [4]
तब ही तें बाको चित्त चंग सो चढ़त हैं। [1]
डोलत फिरत नहीं खोलत हिये की पीर,
मेरी कर तेरी सौंह तो जस पढ़त हैं॥ [2]
तुम तो सुघर स्यानी कहिये सबैई बात,
चलिये जरूर बैठें कहो का कढ़त हैं। [3]
मेटो मन बाधा हठी पूजै मन साधा वे तौ,
रातौ दिन राधा राधा राधा ही रटत हैं॥ [4]
- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (54)
हे राधिका! जब से श्री श्यामसुंदर ने तुम्हें निहारा है, तब से उनका चित्त पतंग के समान आसमान में उड़ रहा है। [1]
श्यामसुंदर मानो डोलते हुए फिरते हैं और अपनी हृदय की पीर किसी से कह भी नहीं पा रहे। मैं अपने हाथों से तुम्हारी शपथ खाकर कहता हूँ कि वे दिन-रात केवल तुम्हारा ही यशोगान करते रहते हैं। [2]
हे प्यारी जू, आप तो सुंदर और स्यानी हो। आप ही बताओ, आपका क्या बिगड़ेगा यदि आप श्यामसुंदर से मिलेंगी और उनके संग आसन पर विराजमान होंगी? [3]
श्री हठी जी कहते हैं कि श्री श्यामसुंदर के हृदय की समस्त बाधाओं को मिटाकर उनकी समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण कीजिए, क्योंकि वे अनन्य भाव से दिन-रात “राधा राधा राधा” ही रटते हैं। [4]

