मेरौ मन श्रीवृन्दावन अटक्यौ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (154)

मेरौ मन श्रीवृन्दावन अटक्यौ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (154)

मेरौ मन श्रीवृन्दावन अटक्यौ ।
राख्यौ श्रीहरिदास विपुल बल भूलि न इत उत भटक्यौ ॥ [1]
बिसरे बिस्व विलास त्रास उपहासनि नेकु न मटक्यौ ।
उपज्यौ अति आनंद हिये सुख सुफल प्रेम लै लटक्यौ ॥ [2]
दियौ प्रसाद प्रतीति प्रीति के महल कुमहलन हटक्यौ ।
श्रीबिहारीदास दंपति सुख चैननि नैंन मधुर रस गटक्यौ ॥ [3]

- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (154)

मेरा मन श्री वृंदावन धाम में अटक गया है ।स्वामी श्रीहरिदास जी और श्री विट्ठल विपुल देव जी की कृपा से अब यह भूल कर भी इस निज महल श्री वृन्दावन धाम को छोड़कर कहीं इधर उधर नहीं भटकता । [1]

विश्व के अनेक प्रकार के विलास तो स्वत: ही बिसर गए एवं समस्त प्रकार के भय एवं उपहास भी अब नेकु [थोड़ा] भी विचलित नहीं कर सकते । हमारे हृदय में अति आनंद उपज रहा है, और अपने अनन्य प्रेम को सफल मान हम उसी सुख में झूमते रहते हैं । [2]

प्रेम का यही प्रसाद मुझे मिला कि अब मुझे महल की टहल मिल गयी । श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि इसी कारण अब हम सुख चैन से दिव्य दम्पति श्री कुंज बिहारी बिहारिनी का मधुर रस इन नैनों से गटकते रहते हैं । [3]