हरि के सब आधीन पै, हरी प्रेम-आधीन ।
याही तें हरि आपुहीं, याही बड़प्पन दीन ॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (36)
यद्यपि समस्त चराचर जगत भगवान श्री हरि के ही अधीन है, परंतु स्वयं श्री हरि प्रेम के अधीन हैं। इसी कारण भगवान ने प्रेम को अपने से भी अधिक बड़ा माना है।
याही तें हरि आपुहीं, याही बड़प्पन दीन ॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (36)
यद्यपि समस्त चराचर जगत भगवान श्री हरि के ही अधीन है, परंतु स्वयं श्री हरि प्रेम के अधीन हैं। इसी कारण भगवान ने प्रेम को अपने से भी अधिक बड़ा माना है।

