जे नहि लोक वेद गति जानहिं - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (146)

जे नहि लोक वेद गति जानहिं - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (146)

जे नहि लोक वेद गति जानहिं ।
कुल परपाटी चित न आनहिं ॥ [1]
सत संतन आचरण घनेरे ।
तिनहूँसौ राखत मन फेरे ॥ [2]
ब्रज मणि नवलकिशोर-किशोरी ।
तिन छवि रस गति मति जिन बोरी ॥ [3]
गुप्त रहस्य भाव थिर मन में ।
ते साधारण पुरुष न जनमें ॥ [4]

- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (146)

वे भाग्यशाली जन जो न तो संसार की मर्यादा, वेदों या कुलों को स्वीकार करना चाहते हैं । [1]

न तो वे महान संतों के चरित्र को जानना चाहते हैं और न ही उनका संग करना चाहते हैं । [2]

उनका मन तो ब्रज मणि नवल किशोर किशोरी की छवि के रस में ही ठहरता है । [3]

ऐसी महान रसिकों की स्थिति साधारण नहीं वरन् असाधारण है । [4]