माथे पे मुकुट देखो चन्द्रिका चटक देखो,
भृकुटी मटक देखो मुनि मन भाई है। [1]
टेढ़ी सी अलक देखो कुण्डल झलक देखो,
चंचल पलक देखो महा सुखदाई है॥ [2]
सुन्दर कपोल देखो अधर अमोल देखो,
लोचन सुलोल देखो खंजन लजाई है। [3]
वंशी रव घोर देखो सांवरो किशोर देखो,
वृन्दावन ओर देखो कैसी छवि छाई है॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (19)
श्री कृष्ण के माथे पर विराजित मुकुट को देखो, चंद्रिका की प्रभा को निहारो, और उनकी भृकुटी की मटक को देखो, जो मुनि जनों के चित्त का हरण करती है। [1]
उनकी घुंघराली अलकों (लटों) को देखो, उनके कानों में झलकते हुए कुंडलों को निहारो, और उनकी चंचल पलकें देखो, जो महासुख को बरसाने वाली हैं। [2]
उनके सुंदर कपोलों (गालों) को देखो, उनके अनमोल अधरों (होठों) को निहारो, और उनकी अति चंचल लोचन (नेत्रों) को देखो, जिन्हें देखकर खंजन पक्षी भी लज्जा से युक्त हो जाता है। [3]
साँवरे किशोर की वंशी बजाते हुए की मंजुल छवि को देखो। श्री डंडी स्वामी हरे कृष्णानन्द सरस्वती कहते हैं कि श्री वृन्दावन की ओर निहारो, जहाँ कैसी अद्भुत छवि चारों ओर छाई हुई है। [4]
भृकुटी मटक देखो मुनि मन भाई है। [1]
टेढ़ी सी अलक देखो कुण्डल झलक देखो,
चंचल पलक देखो महा सुखदाई है॥ [2]
सुन्दर कपोल देखो अधर अमोल देखो,
लोचन सुलोल देखो खंजन लजाई है। [3]
वंशी रव घोर देखो सांवरो किशोर देखो,
वृन्दावन ओर देखो कैसी छवि छाई है॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (19)
श्री कृष्ण के माथे पर विराजित मुकुट को देखो, चंद्रिका की प्रभा को निहारो, और उनकी भृकुटी की मटक को देखो, जो मुनि जनों के चित्त का हरण करती है। [1]
उनकी घुंघराली अलकों (लटों) को देखो, उनके कानों में झलकते हुए कुंडलों को निहारो, और उनकी चंचल पलकें देखो, जो महासुख को बरसाने वाली हैं। [2]
उनके सुंदर कपोलों (गालों) को देखो, उनके अनमोल अधरों (होठों) को निहारो, और उनकी अति चंचल लोचन (नेत्रों) को देखो, जिन्हें देखकर खंजन पक्षी भी लज्जा से युक्त हो जाता है। [3]
साँवरे किशोर की वंशी बजाते हुए की मंजुल छवि को देखो। श्री डंडी स्वामी हरे कृष्णानन्द सरस्वती कहते हैं कि श्री वृन्दावन की ओर निहारो, जहाँ कैसी अद्भुत छवि चारों ओर छाई हुई है। [4]

