अब देहु ब्रज को वास मुहिं प्रभु, आश यह मेरे हिये  - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास

अब देहु ब्रज को वास मुहिं प्रभु, आश यह मेरे हिये - श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास

अब देहु ब्रज को वास मुहिं प्रभु, आश यह मेरे हिये ।
रेणु तृण द्रुम लता खग मृग, होहिं जो तुम्हरे किए॥

- श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास
 
हे प्रभु, मेरे हृदय की यही अभिलाषा है कि अब मुझे ब्रज का वास प्रदान करो, भले ही ब्रज की रेणु, तृण, वृक्ष, लता, पक्षी, पशु आदि किसी भी योनि में (जैसा आपको उचित लगे) रखो।