जै जै जै लड़ैती प्यारी की - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रिंगार रस के पद (54)

जै जै जै लड़ैती प्यारी की - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रिंगार रस के पद (54)

जै जै जै लड़ैती प्यारी की ।
कुंजबिहारिनि अति हितकारिनि अद्भुत रूप उज्यारी की ॥ [1]
नित्य लाल कौ रंग बढ़ावत हँसि हँसि भुजा सु धारी की ।
श्रीललितकिसोरी रसिक सिरोमनि जीवनि प्रान हमारी की ॥ [2]

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (54)

लड़ैती प्यारी श्री राधा की जय हो, जय हो, जय हो जो कुंजों में नित्य विहार करती हैं, जो अति हितकारिनी हैं एवं जिनका अद्भुत रूप उज्जवल है । [1]

जो सदा श्री लाल जी [कृष्ण] का रस रंग बढ़ाती हैं, एवं हंस हंस कर उन्हें अपने अंक में भर लेती हैं । श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि श्री राधा रसिक शिरोमणि हैं एवं हमारे जीवन की प्राण आधार हैं । [2]